घणैई दिनां सूं

नईं सोच्यो थारै सारू

घणे दिनां सूं

नईं लिखी कविता कोई

घणैई दिनां सूं

नईं बापरी घरां कोई उदासी

घणै दिनां सूं

नईं मुळक्यो

नईं आई जोर सूं हांसी

घणे दिनां सूं

नईं कर पायो हूं

निज सूं कोई बात,

स्सौ करणो

इण भीड़ मांय

मुस्कल हुवै स्यात

पण

होऊं हूं जद-कदई एकलो

मैसूसूं निज रै मांय

एक ओर हियो

थारो दियो

अनै सुणू हूँ

उणरै आळे-द्याळे

हांसी, झिंड़की,

ओळमो, सिकायत

हिचकी, निसांस

जाणू हूँ

कै बेतरतीब है आं रो होवणो

पण है कितणो खूबसूरत

कितणो मनमोवणो

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत काव्यांक, अंक - 4 जुलाई 1998 ,
  • सिरजक : शंकरलाल मीणा ,
  • संपादक : भगवतीलाल व्यास ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी
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