किण विध करूँ म्हे पतियारौ!

रुत रै बायरै माथै

काळुन्टे गिगनार माथै

राहू केतु रै जाळे मांय फंस्या अबै

सुरज चाँद माथै।

दीखत रा ही फुटरा

रोहिड़ा रा फूल

मांय सूं ताता घणां

ऊपर दीसे कूल

बैम री बैल उगी इण जड़ मांही

ना बबूल ना खेजड़े माथै

कुर्सी माथै रैयौ नीं है

किंया रैवे नैम-कानूनां माथै।

नैण बिना कोई सैण नीं जग मैं

रैयौ अबै सुख-चैण नीं जग में॥

स्रोत
  • पोथी : साहित्य बीकानेर ,
  • सिरजक : सुधा सारस्वत ,
  • संपादक : देवीलाल महिया ,
  • प्रकाशक : महाप्राण प्रकाशन, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै