जठै

रिगस्यो

पेट रै स्हारै

चाल्यौ

गुडाळिया...

करी ही थड़ी

डगमग-डगमग

लाम्बै चौड़े

आंगणै...

गमग्यौ बो आंगणो

बस तणी है

भींता भींता।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली ,
  • सिरजक : कमल रंगा ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी साहित्य संस्कृति पीठ
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