चहूं दिश चाय री प्याली रे

बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

मांचे माथै पड़्यो रैवै, जद रामरी टेम

कुरलो करै मुंहडो धोवै, चाय पीवण रो नेम–

उठतो फेकै राली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

अैहड़ी आदत पड़ी चाय री, रोटी दीनी छोड़,

भूखो तिसो रैवै रात दिन, फूटै चाय बिन भोड

सांतरी आदत घाली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

छोरा छोरी सगळा रिणकै, पगफावै परभात,

जी सोरो हुज्या सगळां रो, प्यालो आवै हाथ

आवै मुंहडै पर लाली रै–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

घर में पी होटल में पीवै, मिलै जितरी गटकाय,

अेक दोय रो ज्ञान नहीं है, कूअै लागी लाय

चावड़ी चोखी चाली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

जागरण और सत्संग रै मांही, खूब बणावै चाय,

प्रथम प्यालो भोग लगावै, गणेश जी नै जाय

देवां नै आदत घालो रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

बरत करै इग्यारस पून्यूं, चाय पीवण रो जोग,

भोग लगावै ठाकुर जी नै, कट किरोडूं रोग–

औषधि आछि चाली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

चाय रो रंग सगळां सूं गहरो, सब रंगो में तेज,

नाचणा गावणा फीका लागै, हुए इयै में जेज–

पीवै कोई किस्मतशाली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

राजा और रंक सूं लेकर, सगळा हुया अबीन,

बाबू हाकम मुनीमां, री खूब उडावै नींद

होठों पर सोहे प्याली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

अेवड़ रो अेवाळियो पीवै, भर-भर खूब तब्बीठ,

सगळा राखै सरोजाम, बा मुंहडै लागी मीठ

अेवड़ में बाजै टाली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

जातो करतो अंगरेज वो, खूब झलाग्यो डाळ,

उल्टै बख आछी पकड़ाई, कूदै नौ नौ ताळ

भारत में आफत घाली रे–बच्यो नहीं घर कोई खाली रे।

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : पुरखाराम ,
  • संपादक : मूळचंद 'प्राणेश' ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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