तावड़ियै में फुलड़ा दीसै ऊजळा

पण वां पै लिखियोड़ी भासा सांझ री।

कद तांई नापांलां इण आकास नै

ढाबां कीकर छीजता विसवास नै

बांधां कीकर नैणां री रंग डोरियां

चितरावां कीकर सपना री गोरियां

अळगै सूं दीसै आडावळ मोवता

पण बातां रा ब्याळू कोनी धापणा।

कितरा दिन आख्यां में आखर ऊगसी

बिना ठिकाणै कागद कियां पूगसी

बोली पळट्यां सूं पळटै नीं भावना

राख सकै कितरा दिन कोई पावणा

सैंद पिछाणां काढण आळा मोकळा

पण वां में सूं कुण-कुण सागै चालसी?

घणा-घणा रा छपरा चूवै मेह सूं

अेकै साथै मांग रैया सै देव सूं

सगळा चावै लहर्‌यां पाळै चालणो

जूना फाटा बैवारां नै पालणो

दीसण में दीसै सूरज रा सायना

पण मिनखापण वांरै नेड़ो जाय नी।

आओ सगळा मिलनै धूणी ठारद्‌यां

डूबतड़ा नै परळी पार उतारद्‌यां

ढबो मतीना, बगत हाथ सूं जा रह्यो

सांमी झांको नुंवो जमानो रह्यो

चौघड़ियै में बंद करो मत जूण नै

दूनिया री अरथावण पलटी जायरी।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : वेद व्यास ,
  • संपादक : रामेश्वरदयाल श्रीमाली ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : फरवरी, अंक 12
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