जग में माच रियो कोलाहल
मन में अेक सूनोपण क्यूं है?
मुस्कानां बेसरम घणी है
आंसू भोगै देस निकाळो,
सत्ता पौढ़ रही महलां में
जनता ताप रयी उनाळो।
गळी-गळी है जगरमगर
आंगण में अंधेरो क्यूं है?
छाती ठोक खड़ी मंजिलां
बावनियो इनसान बण्यो क्यूं?
साजिसां रा दैंत-दानवी
जीवण नै बेहाल करै क्यूं?
बरस रियो है रंग घणकरो
आंचल सैं मटियाला क्यूं है?
धन अर धरती कांईं आपां
सुख-दुख रा वांटा करता हा,
अैड़ी रूड़ी परम्परा नै
अब सगळा बिसरायी क्यूं है?
राज मारग पर रेल-पेल है
गली-ग्वाड़ वीराना क्यूं है?
चंदा पर चढ़ चुक्यो आदमी
सूळी पर टंग चुक्यो आदमी,
सस्त्रां री सौदेबाजी में
खुद बी तो बिक चुक्यो आदमी।
आसमान री वात करां पण
धरती सूं अणबोला क्यूं है?
जग में माच रियो कोलाहल
मन में इक सूनोपन क्यूं है?