मरवण पनघट पर खड़ी, लियां इण्डूणी हाथ।
घड़ो भर्यो पड़यो पाळ पर, जोवै परदेसी की बाट।
काल आयो जैया आईज्या, म्हारो जीव झिकोळा खाय।
मायड़ देसी ओळमो, म्हानै घड़ो उंचाकै जाय॥
गीत
बो काल आयो और गयो कठै, मैं बाट उडिकूं खड़ी अठै
बो म्हानै घड़ो उंचावणियो
बो परदेसी गयो कठै…।
म्हानै यूं लागै जाणी आवैगो, म्हानै आकर घड़ो उंचावैगो
मैं मन ही मन में बात करूं, वो सैना में समझावैगो
बिंकै आयां ही औंचाट मिटै, पण मरज्याणो गयो कठै
वो परदेसी गयो कठै…
बिंकी भोळी भाळी सूरत है, जांणी अजंता की मूरत है,
वो बतळाय बोलै कोनी, पण म्हानै बीं की जरूरत है
वो आवैगो पण नहीं डटै, जावै गो बीं कै जचै जठै
वो मरज्याणो गयो कठै
वो परदेसी गयो कठै…
म्हानै खड़्यां-खड़्यां ही दिन ढळगो
जाणै बो बळज्याणो कित मरग्यो,
मैं बिना घडै़ ही चाल पड़ी, इतणै में खुड़को खुणग्यो
मैं खड़ी रह गई भौंचक्की, वो चुक्यो न मैं चुकी
अब बतळायां ही पार पडै़, आज्या बैठां यार अठै
बता इतणां दिना तूं रह्यो कठै
वो परदेसी गयो कठै…।