लाल किलै पर बीरघंट को टंकोरो बाज्यो तो,
म्हांरी भुजा फड़कबा लागी।
आपांका घर की किंयां दीवार तड़कबा लागी,
म्हांरी भुजा फड़कबा लागी।
टूटी सीमा म्हारै धीरज का समदर की सीमा टूटी।
कुण की सामत आई म्हांरी पूजा की थाळी नै लूटी।
कुणी करै ऊजाड़ खेत मैं म्हारी साखां नै कुण चूंटी।
नजर अठीनै नाक गाडदां आंख मांही नै आखी खूंटी।
आज अहिंसा की छाती पर अंगारो आयो तो,
झटपट मूल समझ में आगी।
और अहिंसा भेस बदळ नै रणचंडी बण जागी,
म्हांरी भूजा फड़कबा लागी।
जो मिलियो सा खायो म्हां तो गेलै-गेलै आया छा।
खुद की सीमा-सीमा में म्हां घोटा घणा घुमाया छा।
प्रजातंत्र नै पाळ्यो टाबर नै मोट्यार बणाया छा।
चन्दो बण चमक्या तो लारै तारां नै चमकाया छा।
राग-रंग कै बीच ढोल को ढम्माको सुणियो तो,
कामण सेज छोड़ नै भागी।
अर तिसियों मरती तलवारां म्यानां सूं बारै आगी,
म्हांरी भुजा फड़कबा लागी।
म्हांरी फूल कुंवर नै दो-दो गरह साथ में लागै छ।
दो की बातां छोड अठै नौ गरह अछूता भागै छ।
केसर की क्यारी सारी सीमां पर आग सुलागै छ।
आज देस में करो दसैरो दूरगा पूजन जागै छ।
हर-हर महादेव को जद म्हूं हुंकारो सुणीयो तो,
झट बीड़ा की थाळी आगी।
अर गीत बदाणा गूंज्या म्हारी बहणा तिलक लगागी,
म्हांरी भुजा फड़कबा लागी।
जनम कुंडली में तो आखी उमर जंग को जोग छ।
भुजा ऊपरै करो भरोसो तो धरती को भोग छ।
जय हो जीत तिरंगा की यो समर बीच संजोग छ।
मांचा पर मरबा को कोनी रण खेतां को रोग छ।
कस्यां देस को कदी जंग को परवानो आयो तो,
म्हांरी सजनी शकुन मनागी।
अमर सुहागण होगी जद प्रीतम कै गोळी लागी,
म्हांरी भुजा फड़कबा लागी।