इण डूंगर माथै

कुण चढै?

गांव रा सगळा लोग

भेळा व्है’र

अेक दूजा सूं

पूछ रया है–

इण डूंगर माथै

कुण चढै?

अेक बोल्यो–

म्हैं चढ़ जावतौ

जे डूंगर

इतरौ ऊंचो नहीं व्हैतो।

दूजो बोल्यो–

‘ऊंचो तो व्हैणो चाईजै

ऊंचौ नहीं व्है तो

डूंगर किस्यो

अर गैरो नहीं व्है तो

समदर किस्यो?

बात री चढाई री है

चढ़ाई घणी अबखी है।

भींत री तरै

खड़ी चढ़ाई

सागै ढाळ भी

व्हैतो तो म्हैं चढ़ जावतो।

तीजो बोल्यो–

थें कांईं चढ़ोला

डूंगर माथै!

डूंगर है डूंगर

ऊंट नहीं है भोळा!

आप-आप रै घरां जावौ

अर काम कमतर संभाळौ

म्हैं दिनूगां जास्यूं से’र

बठै सूं पोथी लास्यूं

पोथी में मंडियोड़ी है

डूंगर चढ़णै री कळा।

डूंगर बापड़ो सुण रैयो हो

सगळो संवाद

उण निसांस नाखी अर

मन मन बोल्यो–

हे राम!

किण गांव में

जलम दे दियो म्हनै

अठा रा मिनख

पगां रो काम

जीभां सूं करै

अर

चरचा रै पाण

डूंगर चढ़ै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भगवतीलाल व्यास ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 14
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