नीं वापरी ऊरमा

नीं हुयी फुरकण

है अजेस गूंगा

म्हारा जीवण आखर

थारै फूभायला हुयां पछै...

जीवूं उडीक में

हुवैला राजी थूं,

अबार नीं तो

आगलै किणीं

भो-आगोतर में।

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी ,
  • सिरजक : कमल रंगा
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