कियां रचाऊं मेंहदी हाथां, कियां गुंथाऊं राखड़ी

कियां जळाऊं नेह दीवलो, कळपै काया बापड़ी।

कांई बगत आयगी खोटी

खींचै बीच बजारां चोटी

लिछमी जाय तिजोरी लेटी

भूखी करसणियां री बेटी

कियां मुलाऊं मोल बजारां, बाट खायगो ताकड़ी

कियां जळाऊं नेह दीवलो, कळपै काया बापड़ी।

उलटी गंगा बैवण लागी

स्राप छिनाळां देवण लागी

हाट खोल कर बैठी सीता

रामराज रा हुवै फजीता

कियां बिजाऊं बीज खेत रा, बेल खायगी काकड़ी

कियां जळाऊं नेह दिवलो, कळपै काया बापड़ी।

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : बस्तीमल सोलंकी भीम ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 04, अप्रेल
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