राख्यो जा तो हाथ नै रखद्यो
बिगड़ेड़ी जबान पर।
मत करियो विसवास कदै थे
दो मुंहै मेहमान पर॥
सिरफ भरोसै पर चालण रो
बगत आजकल बदळ गयो,
रिसतां री छीना झपटी में
सिखर नेह रो पिघळ गयो,
मत सहयो, ठिठको, भय खाओ,
बगुलां रै अैलान पर।
बो ही श्लोक हुवै है पावन
मानवता रो जिण में गुंजन
बो ही जिण फळदायक होवै
आतम चरित रो जिण में चंदन,
गति रो स्पंदन तोड़ देयो मत
गेलां रै व्यवधान पर।
मत करियो विसवास कदै थे
दो मुंहै मेहमान पर॥