रात रौ काळौ पड़दौ पड़गौ
इसी बगत में वै आपरी यात्रा सरू करी।
म्हैं अरदास करी—
“औ प्रेमी पागल है, मतवाळौ है, अपमानित है।''
दया कर!
लालसु इच्छावां इणनै अणूतौ दुखी करै।
जठीनै ई इणरा निबळा पग बधै
उठी सूं तीखा बाणां री बिरखा हुवण लागै।
वै मुळक बिखेर दी
अर भळकगी बीजळी
फाटगौ काळौ पड़दौ।
कुण फाड़्यौ?
मुळक अथवा बीजळी?
म्हैं नीं जाण सक्यौ।
वांरा स्वर हा—
“म्हैं उणरै मन-मिंदर रौ वासी हूं।
वौ हर पल म्हारा दरसण करै है।
पूरौ कोनी कांई इत्तौ?
पछै थांरी अरदास किसी?
क्यूं?''