तपतै तावड़ियै में ऊभौ

सूरज री ऊकळती किरणां

लू लपटां अर आंधी सांमी

अंतै धैजो धार

हां! हरदम हो त्यार

लथपथ होय पसैवै मांही

ललक लैय जीवण, जीवण री

सुख रा सपना पाळ

मेहणत सूं धरती नै सींचै

मीठी रागड़ली में गावै

गीत देख'र हरियाळी नै

तूटौड़े तन-मन सूं हंसतौ

ले-ले ऊण्डी सांस।

टंक दोय री रोटी पावण

खेता रै अधबीच जाय’र

रैवै अडग हिमाळौ बण'र

करतौ काम टाबरां साथै

कदै नीं हारे चौरासी सूं

आथड़तौ ऊजड़ मारग में

उठ जावै हर बार अेकलो

बांध-बांध विसवास।

कदै’क रूठै इंदर इणसूं

बरसा बेरूत रा बादलियां

मूंडै आयोड़ौ खोसै

सुख रा सपना जद होमीजै

फेरूं पाळै पाछै सपना

ले-ले मोटी आस।

खाईजै मन-मन में खारो

पण बा'रै सूं हंसतौ-हंसतौ

देवै इक संदेस

हरख-हरख हरमेस।

स्रोत
  • पोथी : इण धरती ऊजळ आंगण ,
  • सिरजक : महेंद्रसिंह छायण ,
  • प्रकाशक : रॉयल पब्लिकेशन
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