बाट जोवतां जेठ बीतग्यौ, घटा घुमड़ी बरसी

मास असाढ छांट नीं बरसी, माटी मेह नै तरसी

सांवण सगळौ सूखौ रह्यौ, तीजणियां मन में नीं हरसी

सुगन चिड़ी रूंखां सूं बोली, अबकै काळ अनोखौ पड़सी

गेह डंबर परभात पौहरां, सांझ पड़यां बायरियो सीतळ

नैण फाड़ियां टुग-टुग जोवै, आभै नै जन-मांणस निरबळ

सांवण भादव री रातां में, नभ मंडळ दीसै है निरमळ

बरसण लागे उण वेळा जद, मिनखां रै नैणां सूं जळ

सूख गया सरवर, नद, नाडी, पांणी पुग्यौ ठेट पताळ

सूनी-सुनी लागण लागी, जळ बिन चारू कांनी पाळ

रूंख जका लीला रैता हा, पान-पान झड़ सूखी डाळ

धरती नै झट आय घेरले, कुण जाण क्यूं बेरी काळ

भूखमरी बेकारी फैले, घणै मांनखै रा घर छूटै

ऊंचा चढज्या भाव चीजां रा, सरे आम बोपारी लूटै

चारै बिना मर जाय डांगरा, पसुधन रो हुय जावे घाटी

धान नीपजै नीं खेतां में, मिळै अणूतौ मूंघौ आटौ

चौमासै रा चार महीना, काळ बरस में लागै दोरा

बैरागी रौ रूप धारलै, थळवट रा अै धरती धोरा

स्रोत
  • पोथी : अंवेर ,
  • सिरजक : रेवंतदान चारण ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी
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