सुपनै में आवै कोई

ओळ्यूं में गावै कोई,

तीज-तिवारां भटका आवै,

गोरल नै भरतार रा।

अणछेड़्या सिणगार रा॥

चांदां सूं चांद लजावै,

तारां री नींद चुरावै,

बाटड़ली में पढ़्या जावै,

ढाई आखर प्यार रा।

अणछेड़्या सिणगार रा॥

जोबनियो झोला खावै,

आवण रा सोणा मनावै,

कुण जाणै कद पिवजी आसी,

बिलम रही घरनार रा।

अणछेड्या सिणगार रा॥

नैणां में सुरमो सारै,

हिवड़ै सूं नाम उचारै,

परदेसां सूं कागद आया,

कदै नहीं समचार रा।

अणछेड़्या सिणगार रा॥

हींडां पै झोटा खावै,

साथण नै यूं बतळावै,

जाणौ कठै रमड़ग्या पिवजी,

दाणां खिल्या अनार रा।

अणछेड़्या सिणगार रा॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : तारादत्त ‘निर्विरोध’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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