अचरज है कै’ इण बस्ती रा लोग

हाल जीवै है!

जद कै, यां सगळां री मौत

हुई ही मोरां में—गोळ्यां लागण सूं

अर यांरा नांव ‘ठंडै-युद्ध’ में

मरण वाळां री सूची में छप्योड़ो है।

म्हूं रोजीना तड़काऊ रा उठनै

इण बस्ती रै सूखै-अंधारै-ऊंडै

कुंअै मांय उजास नाख’र देखूं कै’

रात रा कोई किणी मुड़दै नै

इण में पटकग्यो’क नीं

जिणसूं

म्हूं दूजी बार कर सकूं

उणरी मौत री घोषणा।

अचरज!

इत्ता दिनां में इण सुभ काम री

सरुवात कोई नी करी।

लागै’क अेक दिन

म्हनै इण बस्ती में

आय’र बसणो पड़ैला

मुड़दां नै कुअै में नाखण सारू।

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : पारस अरोड़ा ,
  • संपादक : मूळचंद 'प्राणेश' ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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