सावण-भादवै री झड्यां। तिसी पिरथी री अमिजेरी बूंद्यां सूं तिरपती। तेजै रो आसाड रै बादळ ज्यूं घूमणो। धोरां ऊपर पपैयां री पीवू पिवू। आंणद नै आंणद रो राज!
गांव खरनाळ! कंवर तेजा नै उणरो मोटयार पण!
‘म्हारा लाडेसर!’
‘के है मां!’
‘थारै जुऐ री चमड़ै री डोर्यां नै ठीक क्यूं करै नी?
‘क्यूं?’
‘खेत नी जोतैला, थारा सैंग भायला बाजरी बोवैला।’
‘बोवण दे, मैं तो अबार खेलूंला।’
‘ना मोती, चोखा टाबर इयां नीं कैवे।’
‘फेरूं मैं किस्यो खेत बोवूं।’
‘तू पूरब सूं पिच्छम खानी आवड़ी घाल।’
तेजो काम में भूत बणग्यो। नागौरी बळदां नै करड़ी मींनत!
ताल सूं लेयनै धोरां ताणी बाजरी रो बोवणो। भौजाई रो भातो लेयनै आंवणो। नाज-नखरै हाळी भौजाई। गुमानण’र छिणक मिजाजण।
‘भाभी मोड़ी क्यूं आई?’
टापरै में काम-काज थोड़ो है कै? थारो भतीजो जिन छोड़ै जद आवूं!’
भौजाई री बोली में रीस!
तेजो बोल्यो ‘ओ भातो कागलां नै नाखदे नैं थारो लाडेसर इतरो भूखो है तो आपरी नानी रांड ने क्यूं नी खाय ज्यावै।’
भोजाई रै हीयै में लाय-बळीता लागग्या। जोर सूं चीखी-’एड़ा बोल क्यूं बोलो।’
‘हां बोलां ला!’
‘बोलो ला तो थारी घरवाळी सुणैला, जिकी बापड़ी आपरै बापरै घरै तेली रै बळद ज्यूं पीसिजै।’
भाभी रो जावणो। तेजै रै हिवड़े में आकळ-वाकळ। धू-धूं धधकती लाट्यां।
‘म्हारो ब्याव कद होयो मां?’
‘बाळपणै में।’
‘कठै?’
‘लागै रे तनै कैणय मालजादी तानो मार दीन्यो है। जणा ई तू इतरो लाल-पीळो होय रैयो है। हमें समझी, जरूर थारी भोजाई तन्नै आपरै बोलां सूं बींध्यो है। मैं कैवूं उणरो सरबस चल्यो जावै।’
‘एड़ी बोल्यां मत निसार मां, बा दूधां न्हावै, पूतां फळै; पण तू मन्ने इतरो बता’क म्हारो सासरो कठै है अर म्हारो सुसरो कुण है?’
‘पनेरसर’ - ‘थारै सुसरै रो नांव में’ ताजी है।’
‘सेवक जा जोतसी नै बुलायनै ल्या।’
सेवक रो जावणो, जोतसी रो आवणो।
‘पगै लागूं!’
सवाल ने जुबाब।
‘आ जातरा चोखी नी है कंवर तेजाजी, इण जातरा में आपरा दुसमणां री मोत लिख्योड़ी है।
रीस ने कड़ा बोल।
‘नाठ जा पंडत-गंडत, नीं तो थारो मूण्डो आक’र धतूरा सूं भरद्यूंला।’
तेजै रो पंडत नै झिड़कणो।
तेजै रो लीलो घोड़ो। सोनै जेडी काठी। रेसमानी गूदड़ी। रेसमानी डोर सूं बंदेडी लोवै री लगाम। गळै में घूघरां री माळा। माथै ऊपर सोनै री झालर अर गोडां रै ऊपर झण-झण बाजणती पैजण्यां।
‘मां, आसीस दे।’
‘कद पूठो आवैला?’
‘पीपळां रा पानका गिणती रैये, जितरा पानका हैं उत्तरा दिनां सूं पूठो आय जावूंला। सेवक चिमना, म्हारी मां री घणै चित-मन सूं चाकरी करियै।
बस।’
प्रिस्थान।
पैली भेंट सुनार, दूजी में रांड बामणी, तीजी में खाली धड़ांळी पणियारी चौथीं में सूखी लकड्यां री गाड़ी, पांचवीं फोकरी। पण तेजै ने फीकर कोनी। लीलो घोडो’बो। दौड़ लीला, दौड़, पून बेग सूं दौड़, दौड़.... दौड़... दौड़!
लीला, फेरूँ दौड़!
हुंकार नै धुन।
पनेरसर, गोदूळि-वेळा। पणघट ऊपर फूटरी फरी इन्दर री पर्या! तिस डाढ़ी तिस!
‘पणियारी, पाणी प्यावोला?’
‘ओ कूवो पड्यो, जायनै पील्यो!’
‘नी मरवण, मैं’र म्हारो घोड़ो रेसमानी डोर सूँ निकळयोड़ो ई पाणी पीवांला।’
‘आप कुण सिरदार हो अर कठै जावणो चावो?’
‘म्हें खरनाळ आयां हां, धोळै जाट हां, अर मे’ता पटवारी रै अठै जंवाई बणनै जावांला। मनै तेजो कैवै है।’
“नणदोईराज! ल्यो पाणी पीवो सा’ अर म्हारा कूंपळ सूं कूळा हाथां सूं पीवो सा।
तिस री तिरपती
‘मे’ ताजी रै घर रो मारग किसो जावै?”
“ओ, पण हाट मांय सूं घोड़ै नै नचांवता जाइज्यो सा’।”
हाथ सूं सैन अर मधरो-मधरो मुळकणो।
तेजो हाट’र घोड़ो।
ठुमक ठुमक!
कूदणो, नाचणो, हिणहिणावणो थमणो’र पाछो मचळणो।
चोपड़ में वाह-वाह!! तेजै रो मस्ती सूं झूमणो। मन रा लाडू खावणा। बो, उणरी बीनणी, सुख-दुख री बात्यां, मीठा ओळमां, मोटयार, साळ्यां’र हैंसी-मजाक!
सुपनो टूटयो।
मे’ता रो घर। लीलै रो हिण-हिणावणो। डूकियां रो चिमकणो।
‘ओ कुण है ठिठोड़ो, दूंवती गाय नै चिमका दीनी। ओ लीलै घोड़ै रा असवार, म्हारै खेत नै चिड़ियां चुगगी है अर घर नै पावणा चट करग्या है। कदेई रात’र कदेई दिन। राम ई बंचावै इण पावणां सूं।’
सासू रा तीखा बोल!
तेजै रो अपमाण! अपमाण री लाट्यांसूं उणरो हियो बळ नै राख होयग्यो। बो आपरी आधी-अधूरी मनस्यावां लेयनै अपूठो मुड़ग्यो।
भाभी रो आणो!
‘भैण म्हारी आज तू सोळै सिणगार करले।’
“क्यूं?”
‘रतना जड़ी नथ पै’रले।’
‘क्यूं?’
‘पाटम्बर री चोली पैरं ले!’
‘क्यूं?’
‘जरीदार घाघरो पै’रले।’
‘पण क्यूं?’
‘क्यूं ‘क आज थारै माळियै में घिव रो दीवो चसैला।’
‘कठै भाभी, बै तो कोसां आगै बैठ्या है।’
‘ना, नणदल बाई ना, बै लीलै घोड़ै ऊपर असवार होय नै पधारया है;
म्हारै हाथां सूं पाणी पीयनै आया है।’
बजरपात!
‘अबार ई मां सा’ एक लीलै असवार नै ताती-ठंडी कैयनै काढ्यो है’
‘फेरूं थे नाठो, नीं जणां अनरथ होय जावैला। अबैं बै थारा बुलायाईज आवैला।’
बिरहण रो घोड़ै रो पीछो।
भारत रा सैंसकार!
‘मैं कियां हेला देवूं, मुण्डो फेर देखै बी कोनी, देखै तो मैं म्हारो चीर फाड़’र उणनै थमण री सैन करूं अर ठै’रायल्यूं! ओ म्हारै काळजै री कोर’ ठै’र, छिण भर मुण्डो फेर नै देख।’
आकळ-बाकळ!
‘लछिया, ए म्हारी धरम री भैण लछिया, जा थारै बै’नोई नै थाम।’
लछिया रा हेला देवणा अर तेजै रो थमणो।
‘बै’नोईजी, थे सिंझ्या पड़यां कियां चाल्या?’ लछिया बोली: ‘इण बखत सैंग जीव आप-आप रा घुरसाळा में जावै!’
‘गूजर री बेटी, अपमाणितं वीर पूठो कोनी जावै।’
‘फेरूं म्हारी झूंपड़ी में अंजल-पाणी करो।’
‘म्हे घोड़ै ऊपर चढ़ग्या हां, पचास कोस पछै ही उतरांला।’
अन्तर री पीड़ा। संघर्ष अर आंसूड़ा।
‘बै’नोई सा’ जिकै सूँ भगवान रूस्या है, उणरो कैवणो थे कियां मानोला?’
‘तू घणी दुख्यारण जाण पड़ै, बता तनै के दुख है?’
‘म्हारे चरावै नै मार’र धाड़ेती म्हारी गायां लेयग्या।’ बसक्यां नै बसक्यां।
दया, आग’र परतंग्या।
‘फेर मैं थारी गायां नै ल्यायनै थारी झुपड़ी में अमल-पाणी करूंला।’ लीला, भाग; पून बेग भाग!
जुद्ध जीत नै पूठो आवणो।
लोई सूं लथपथियोड़ो अर घावां सूं चालणी होयोड़ो सरीर, एड़ो सरीर ‘क तिल भर बी उण माथै मेल्यो नीं जावै।
पनेरसर। उणरी कांकड़। मूरछा खायनै पड़णो। पीणै नाग रो पींवणो अर मोत!
मालम, हळचळ अर गांव रो भेळो होवणो।
चिता, सूरज सूं आण लागणी अर समापति!
लीलै रो अेकलो आवणो! मां रो देखणो। पूछणो, लीला रे लीला, म्हारो तेजो कठै? फेर मुरछा खायनै मावड़ी रो गिरणो!
भोजाई रो हियो फाट’र कूकणो। मावड़ी रो सिसकणो।
सास्वत नै हरोज रो
खेतां में नै खळियाणां में