रात नै सोवती वेळा लुगाई आपरै धणी नै बूझ्यौः ‘आज थे उदास-अलूणा कियां होय रैया हो? दिनूगै सूं थारो मूण्डो देख रैई हूं, एकर बोल्या नी, रोटी-टुकड़ो ठीक सिर खायो नीं। कीं बतावो तो... आज बात के होई?’

धणी चुप रैयो। पण, उणरी आंख्यां बोल-बोल कैय रैईः तनै के बतावूं बावळी, तनै बतावण जोग तो मूण्डो तो को राख्यो नीं! उण वखत, जद मैं आज रै दुख नै नूत्यो, इण घड़ी ‘क रै सुख री लार जिनगानी भर खातर दुख चाल्यो आय रैयो है। इस्यौ दुख, जिणनै किणी रै आगे प्रगट नीं कर सकूंला, जिकै री दाझ मांय तिल तिल बळतौ रैवूंला पण, किणी रै सामै हियै रा दरूजा खोल नै मन रो दुखड़ो हलको नीं कर सकूंला। अर दूजां री के बात। तनै, दुख-सुख री साथण है तू, पण तनै दुख नीं सुणाय सकूंला, कदे नीं जाण तो! कदे नीं जाण तो! लुगाई-मोट्यार दोय सरीर एक पिराण होवै, पिराणां सूं के ओलो-छानो? पण, मैं अबै तेरै सागै एक पिराण भी तो नीं रैय चुकियो हूं। उफ! मै कितरो कमीणो हूं। कोई माफ नीं कर सकैला मनै। तू मनै छिमा नीं बगस सकैली, जद तनै ठा पड़ैला’क मैं कितरो न्यावू काम कर चुकियो हूं। मैं के करम कर चुकियो हूं, इणरो बेरो जद तनै पड़ैला, तू घोर घिरणा करैली। अबै लोक-लाज मेरो मूण्डो सीम राख्यो है। मैं किणी रै आगै कर्‌यै अपराध रो हुंकारो नीं भर सकूं। अर जै हुंकारो भरण रो हियाव होवतो तो आज रो दिन क्यूं उगतो...? एक झूठ नै ल्हुकोवण खातर सौ झूठ बोलणी पड़ै, बियांई एक न्यावू करम माथै पड़दो नाखण खातर अनेक न्यावू करम करणा पड़ै। म्हारै में इतरी सगती नी’क कर्‌यै करम खातर छाती ठोक’र कैय देवूं’क मैं कर्‌यो। इण खातर म्हारी कमजोरी एक अपराध है, जिको एक अपराध नै ल्हुकोवण सारू होयां बगै। हियाव करने कुकरम करण रो हुंकार भरल्यूं तो पिराछित नीं होय जावै। अबै बता, मैं तनै के बतावूं?... कियां बतावूं?’

लुगाई रा नैण मोट्यार रा नैण सूं कीं ताळ उळझ्या रैया। पण नैणां री भासा नै लुगाई नीं समझ सकी।

लुगाई बापड़ी पगां री पगरखी, नैण लीलाड़ रै नेडा। भळै इतरै ऊंचै री बात समझै भी कियां। बा तो पतिपरमेसर रा नैणां में खालीं आपरी जाग्यां भर देख सकी। धणी रा निरबस अर पीड़ सूं भर्‌या भौ-कातर नैणां मांय जोयनै आपरा नैणां में उण पीड़ नै नूंत सकी। उणरा सजळ नैण पति रा नैणां नै कैय रैया, - ‘थांरी पीड़ मनै देय देवो। मैं इण पीड़ रो काजळ घाल नै इणरै दुखदाई कळमस नै धोय नाखूंली, दुख रो दळदर धुप जावेला।

पण, धणी रा नैण इण मंगता नैणां नै पीड़ रो दान नी देय सक्या, जद बापड़ा आखता होयनै नंवग्या।

दिनभर रा धन्धां मैं डूबी लुगाई नै नींद घणी सोरी आयगी। बा अनेकूं बार धणी नै उदासी रो कारण बूझ’र थाकगी। पण उथळो कीं नी मिल्यो। गळगळी होई, रूआंसी होई अर सोगनां कढाई, पर आज धणी को-बोल्योनी सो को-बोल्योनीं। छेवट कद नींदड़ली घेरा घाल्या, बापड़ी नै ठा’ईज नीं पड़ी। अबै भी उण रै मिंच्या नैणां हाळै मूण्डै ऊपर जाचणा अर बूझण रा लेख सेस पड़्या।

लुगाई नै नींद आई जाण, धणी उठ-बैठ्यो। गूंजे सूं कागद निकाळनै भळै बांच्यो। इण कागद रै चूंखळै नै वो आज अनेकूं बार बांच चुकियो। हर बार, बांच्यां पछै, उण रै मूंडै ऊपर उदासी रा अंगदी पग घणा-घणा रुपता गया। कागद रो चूंखो इण उदासी अर अलूणेपण री जड़ है। बो इण कागद नै बांचतो जाय रैयो अर उण रै मूंडै ऊपर डरावणी-डरावणी छैयां मंडती जाय रैई। कागद मांय लिखी अन्तिम पांत उण रै मूंडै सूं अचांचूक फूट निकळी: ‘फेर मिलांला प्रकास, फेर मिलांला!”

कागद उण रै हाथ सूं छूट नै सामैं पड़ग्यो। उण रै डरावणै मुंडे ऊपर जाणै अमावस री काळस पुतगी होवै, अर उणरी आंख्या में जाणै लाय भभूका मार रई होवै अर उणरो भर्‌‌‌‌‌यायो गळो जाणैं अबै चुप ही रैय सकैला। दिनभर सूं चुप रैई जुबान जाणै अबै बोलणो चावै अर वो एक तरै री अजब-सी भारी आवाज मांय अचांचूक बोल पड़्यो- ‘उफ। मैं के कर नाख्यो...? नीं-नीं...ओ आतमघात नीं होय सकै! हित्या है... हां हां हित्या... अर हित्यारो?... मैं तो हूं उण बेगुना’ लुगाई रो हित्यारो...! उण मासूम कळी रो हित्यारो....! दुनियाहाळो, थे इणनै चायै आतमहित्या कैवो! पण, मैं जाणू ‘क हित्या मैं करी है। उफ! प्रकास, तू के कर नाख्यो?... बावळा, बा भोली हिरणी राधा तेरो के बिगाड़ कर्‌यो, जिको तू उणनै दुनिया सूं ही उठा दीनी। राधा... तू, राधा, फेर मिलण री कामना करे? गूंगी, खुद रै हित्यारै सूं फेर मिलैली?... नाऽऽ.... ना! हां-हां, फेर मिलैली... तू फेर मिलैली....। जदई तो इण हित्या रो बदळो चूकैला!... मैं उड़ीकूं राधा, तू जरूर मिली अर बदलो चुकाई!’

प्रकास री जुबान थमगी। अबै वो सोचतेा जाय र्‌यो, ‘आ मौत... आतमघात... हित्या, लोग इणनै आतमघात कैय रैया होवैला! लोगां नै कंई ठा’क सैंकडू मीलां री दूरी माथै बैठ्यो कोई प्रकास हित्या कर दीनी है। कितरी चतराई सूं करी गई है हित्या! बास नीं सकैला। पण, लोगां नै के ठा’क हित्यारो सात महीना पै’ली हित्या कर चुकियो। अबै तो घुळघुळ नै मरी है। प्रकास, तू राधा नै मीठो जहर दीन्यो, एकदम मीठो जहर, जिकै नै खाय नै बा सात महीना भर निकाळ सकी! आज काम आई।

प्रकास री आंख्यां मांय सात महीनां पै’ली रा चित्राम घूमण लागग्या। वै एक-एक बातां उण रै चेतै आवण लागगी, जिकी सात महीनां पै’ली बीती। उणनै लाग रैई, जाणै सात महीना पैली रा बै दिन, जिका राधा सागै बीत्या, आज रै छिण-छिण में एकण सागै समायग्या होवै।

सरूपोत में प्रकास राधा नै आपरै भायलै बिरजू रै घरां देखी। राधा बिरजू री मांवसी री बेटी बै’न लागती। राधा रै मा-बाप नीं हा अर जिकै रो हाथ जीवण भर साथ निभावण खातर अपड़्यो, बो बैरी छव महीनां साथ नीं निभाय सक्यो। दोय बात भी कदै कैय सक्यो अर सुण सक्यो। अणजाण्यो परलोक सिधारग्यो। देवर-जेठ क्यूं बोझो आपरी पीठ माथै लादता अर बैरीड़ो कीं छोड’र गयो कोनी, जिको इतरी लाम्बी जिनगानी नै धक्का देणा होयग्या ओखा। मांवसी में, बापड़ी में राम बड्यो, जिकै सूं निराधार जिनगानी नै आसरो मिलग्यो।

बिरजू अर प्रकास दोनूं भायला। सागै -सागै पढ्या-भण्या, खेल्या-खाया अर दिन पाय नै दोवां री जुगलजोड़ी बिछड़गी। बिरजू जैपर में सिरकारी अफसर बणग्यो अर प्रकास कलकत्तै में एक ऑफिस-क्लर्क। घणा दिनां री मुसाफरी पकायनै प्रकास घरां आयो। बिरजू री याद जागी अर मिलाप ताणी जीव टूट्यो। कागद लिख्यां ‘क एकर आय नै मिल जाय। बाळपणै री क्रीड़ाथळी सूनी-सूनी पड़ी है, एकर इणनै भलै चैळपैळ सूं भर देवां’ पर बिरजू ऊथलै में लिख्यो ‘क काम-काज घणो है। आवण रो मन है, पण फुरसत कोनी। तू एकर जैपर आव आपणै प्रदेस री राजधानी है। अठै री रंगीली छटा देख जाव!’ “नी देख्यो जैपरियो तो कुळ में आकर के करियो।’

प्रकास जैपर गयो। दोनूं भायला घणा दिनां पछै मिल्या। भेळी होयोड़ी हवूंस निकाळी।

बठै प्रकास राधा नै देखी, रूप री उजागर। जोबन अखन-कुंवार। अंग अंग मैं अनंग रंग री लाली अर सांसां में सोरभ रो संचार। पण, मृग नैणां रै तळै? काळस, प्रकास अरथ को समझ्योनी। बिरजू जद राधा रो परचो दीन्यो ठा’ पड़ी ‘क पाळा चिन्त्या रा है, जिका बाली ऊमर में ईज मंडग्या।

राधा प्रकास नै देख्यो, बांको मोट्यार। नैणां री अणथाग भावना रो बुहाव राधा नै पै’ली दीठ माँय बैवा लेयग्यो। बा आपरो संचै कर्‌यो अखै धन इण नैणां नै देय नाख्यो। पण, प्रकास इण धन रो भूखो नीं हो। बो नीं चांवतो’क राधा मरजाद तोड़ै। पण, सदै चुप रैय जावतो’क कदांस इण भोळी राधा रो मन टूट नी जावै। आसंका रो हिवड़ो पण रोज-नित धड़कतो। प्रकास रै हियै में राधा सारू कोरी दया ही। पण, राधा इण दया नै सदै ओर कीं मान’र चाली। प्रकास रो भावुक हिवड़ो राधा रा कूँळा भला सुपनां री नाड़ तोड़ नाखण रो हियाव कदे नीं कर सक्यो। सौ सुख गया तो एक कल्पना रो सुख क्यूं खोसूं? उकसाव राधा रो हियाय बंधावतो गयो।

राधा रो रूं-रूं प्रकास सूं अजाण्यो नीं रैयो। राधा आपरी मन री सैंग पेई-पेट्या प्रकास नै खोल-खोल’र दिखा दीनी। राधा रै आळाडूळ मनपंछी नै प्रकास री भावना रै घेर घुमेर बिरछ रो आसरो मिळग्यो। बा घुरसाळा रचण रा सुपनां देखण लागगी। उणरै जीवण री सूखी क्यारी मांय नुंवा-नुंवा पुस्प खिल उठ्या अर सोरम री मै’कार बापर आई। प्रकास कियां इण पंछी नै उड़ा दैवै’र कियां क्यारी री मै’क हरण कर लेवै। पण, आसंका री आंधी नै नेड़ै-नेड़ै सरकती देख’र उणरो मन घबरा जावतो। इण भयाणी आंधी मांय बापड़ो पंछी, बिचारा कूंळा फूल अर मै’क, सैंग एकण सागै उड़ जावैला। उण रो मन पीड़ सूं छटपटा उठतो। पण राधा रै मन नै दुख’र पीड़ा पुगावण सारू प्रकास रो मन-मांयलो हामी नीं भरतो।

राधा कानी देख-देख’र प्रकास रो मन मांय-ई-मांय रोय उठतो। हियै मांय ऊंडा घाव बणा लीन्या। पण, बापड़ो प्रकास करै, तो कंई? निरबस डूंगी सांस उणरै पल्लै बंधगी। लाज’र मरजाद, दया’र दुख रा अनेकूं भम्बूळिया उणरै माथै मांय लगोतार सरणाट करता बैवता।

मन काठो करनै जैपर सूं जावण री बात बो बिरजू नै कैई। पण बिरजू को मान्यो नीं। पन्दरा-वीस दिन ओर बैठ्‌यो रैवण रो करड़ो हुकम देय दीन्यो बिरजू नै प्रकास कियां बतावै’क मैं अठै रेवणो तो चावूं, पण रैय नी सकूँ। बिरजू आगै प्रकास री चाल नीं सकी अर पूरै महीनै भर ओर रैवणो पड्यो।

इण बिचालै अनेकूं बार प्रकास राधा नै थ्यावस देय नै थमाई राखी। उणरी उतावळ री अगन मांय कदे घीरत नी गेर्‌यो। सदै जुगत रो पाणी नाख’र बुझाई।

राधा कैवती, ‘प्रकास, जमानो पलटग्यो। अबै तो सैंगां रा हिया उदार होय जावणा चायै!’

प्रकास कैवतो, ‘मरजाद तोड़ नाखणी सोरी कोनी गूंगी! उदारता तो हिया मांय होवै! पण, दुनिया में परम्परा री लीक तो कितनी सदिया’र जुगा सूं मंडेड़ी है। अचांचूक कियां टूटै?’

राधा कैवती, ‘तो ऽऽ, फेर प्रकास, कियां निभैला? तू तो चल्यो जावैला अर मैं एकली कियां पाळ’र राख सकूंगी, थारी-म्हारी प्रीत है इण पंछी नै?”

प्रकास रो काळजो धक-धक हाल उठतो। काळी-पीळी आंधी रो भयावणो गुबार आंख्यां री जोत नै धुंधलको कर नाखतो। आगम रा दरसण लोप रैवता। प्रकास अपणै आप नै धोखो देवण री चेष्टा करनै, राधा नै समझावतो, ‘गूंगी कठैरी, चल्यो जावूंला तो के, फेर नी आवूंला?”

‘नीं प्रकास, तू चल्यो जावैला तो म्हारै नैणां रो च्यानणो चल्यो जावैला। अंधारै मांय जीवणो किणविध होवैला? तू अठै जैपर में कीं काम-धंधो जमायले।”

कैय नै राधा प्रकास रा नैणां में जोवती। प्रकास रा नैण उण समै झुक्या रैवता। स्यात्, मांय-ई-मांय सोचता, ‘क अबै के होवैला?’ पण, राधा री घुटण नै हलकाय नै प्रकास आपरै मांय एक घुटण पाळतो रैयो।

छेवट, एक दिन राधा प्रकास आगै आपरो असली सुवाल राख दीन्यो, ‘प्रकास, तू मेरे सागै विधवा ब्याव करले! मैं प्रकास बिना जीवती नीं रैय सकूंली। अर तू प्रकास, मनै जीवती देखणी चावै तो करणो ईज पड़ैला। बता-बता, कद होयो मेरो ब्याव? मैं तो अखन कुंवारी हूं। अबै ब्याव करणो चावूं तो किणी रो के बिगाडूं प्रकास? थारे ऊपर भरोसो राख’र बात कैई है। प्रकास, मैं ‘न’ नीं सुण सकूंली।’

प्रकास राधा री बात सुण, सैमगैम चित्राम ज्यूं होयग्यो। क्यूं वो राधा नै इतरी आगै बधण रो उकसावो दीन्यो। राधा री आस’र भरोसै रा सुपनाँ अबै टूट्या चावै। कल्पना रा रंगमहल अबै खंडहर बणनै ढै’णा चावै। रागां री दुनिया अबै उजड़ी चावै।

‘राधा!’ प्रकास मांय-ई-मांय चिरळा’र बोल्यो।

‘प्रकास।’ राधा बोली। ‘बोल, है मंजूर! हुंकारो दे!!’

‘राधा, अण बोली बातां मत भाख। मैं अबै म्हारै हियै नै घणो दाब्यो-चींथ्यो नीं राख सकूंला। तू बता राधा, कियां होय सकै?कियां होय सकै? पंचां रै सामैं एकरो हाथ थाम लीन्यो! नेम-धरम म्हारै सूं नीं टूट सकैला राधा! तू ईं सोच¬¬ गैली, तू सोच!’ प्रकास रै हियै माथै जड़िया जुगत रा किंवाड़ चरमरायग्या।

‘जद, तू प्रकास, मनै मंझधार में लेजायनै निराधार छोड़ैला?’ राधा बिफरगी।’ इतरो कमजोर तू हो तो पाळ माथै रामरामी कर लेवतो। हियाव नीं हो तो घाट सूं मुड़ जावतो। अबै मैं एकली डूबू, प्रकास! तू किनारै लाग जावैला?’

‘राधा तू गळत समझी!’ प्रकास रो गळो गळगळो होयग्यो। ‘तू गळत समझी। अरथ रो अनरथ मतां कर बावळी, दूजां रा हिया नै परख, समझ!’

‘प्रकास!’ राधा रा नैण ठग्यै मुसाफर री दांई चुंधीज्या सा रैयग्या ‘खुद नै धोखो देवण री चेस्टा मत कर।’

प्रकास रा नैणां सूं हियै री अथाग पीड़ा बैय पड़ी।

राधा रा ठग्या मुसाफरां नै बापड़ा नै मारग नीं लाध्यो।

प्रकास असल नै दाबण री बिफल चेस्टा करण लाग्यो। राधा नै समझावण री, जुगत जचावण री अटकळ भिड़ावण लाग्योः ‘राधा, मैं बिरामण रो जायो, तू बाणियै री बेटी, फेर विधवा। बता, कियां के होय सकै? दुनिया भावनावां रा कच्चा मारगां माथै नीं जथारथ री पक्की सड़कां माथै चालै अर दूजां नै ऊजड़ नी चालण देवै। इण रै पछै, मेरो ब्याव भी होय चुकियो। बा निरपराध मेरो के बिगाड्यो, जिको उण नै धोखो देवूं नेम निभाणो पड़ैला। धरम राखणो पड़ैला! नीं जणा दुनिया में प्रळै नीं होय जावैला!’

“प्रळै रा मनकार्‌या, लीक कद छोड़ैला? नेम धरम लीक तो है। तू तो जिकै दिन पोथी बांच’र सुणाई’क ‘लीक-लीक दोनूं चलै, कायर और कपूतः लीक छोड़ तीनूं चलै सायर सिंघ, सपूत।’ फेर तू सायर सिंघ सपूत कद बणैला? तू भरोसो राख, मैं उण निरपराध रै जीवण में कदे दुख नीं उपजावूंली, पाछो सुख रो दरियाव बैवा नाखूंली।” राधा सकळ कंठ सूं बोलती जाय रैई। “बामण बाणियै रो आंतरो, मिनख-मिनख मांय आंतरो? लीक है। लीक छोड़णी पड़ैला। मैं लुगाई री जात जद आगूंच जूझण नै त्यार ऊभी हूँ, तो तू मोट्यार कंई नीं कर सकैला! मरदानगी दिखा, सायर, सिंघां’र सपूतां री बानगी दिखा!!”

‘पण’ प्रकास कीं बोलणो चावतो।

‘पण के?’ राधा बिचाळै बोल पड़ी। होस हवास सोकीं भूल रैई। “बोल, ऊथलो देय, है हियाव?”

प्रकास दबग्यो। बात नै टाळण री गरज हूं कैयो, ‘इयां हाथू-हाथ कियां निरणै कर सकूं।’

पछै, प्रकास राधा सूं कट्यो-कट्यो रैवण लागग्यो। राधा बात नै ताड़गी।

एक दिन, राधा भलै मोको पाय नै कैय दीनी, ‘जुवाब देय सकै अड़ांस कोनी।’

प्रकास रो जीव ध्यारी में आयग्यो। बोल्यो, ‘जद, विधवा-ब्याव करणो है तो बिरजू नै कैयनै ओर करायो जाय सकै!’

‘ओर री बात ओर, तू जुवाब देवणो चावै तो सीधा सबदां मांय देय। लुगाई मन नै एकर हार्‌या करै। मैं आखी जिनगानी काट नाखूंली। उफ! नीं करूंली प्रकास! दूजी मेरै जेड़ी वै’ नां तो निभाय नै लेय जावै!” राधा री बोली में एक अजब कड़वाहट अर एक अजब मिठास दोनूं रळेड़ा।

जोग-संजोग। प्रकास री तबियत खराब होयगी। राधा उणरी सैंग जिम्मेवार्‌यां आप ऊपर लेय लीनी। रात नै निरी देर ताणी बिरजू री मा अर राधा उणरै खनै बैठी रैवती। तबियत कोई खास खराब नीं होई। बस, सरदी लाग’र थोड़ी सी बुखार चढ़गी अर कफ छाती मांय जमग्यो।

प्रकास अळगै कमरै मांय सोवतो। पण, रात नै राधा प्रकास रै कमरै में आपरा बिछावणा बिछा लीन्या। रोजीना तो बा दूजै कमरै मांय सोया करती, पण आज प्रकास रै कमरै मांय क्यूं? प्रकास समझ नीं सक्यो। ग्यारै बज्यां ताणी बिरजू री मा बैठी रैई, भलै उठनै आपरै सोवण रै कमरै मांय चली गई। राधा उठ’र कमरै रा किंवाड़ जड़ लीन्या अर प्रकास रो आसंका भर्‌यो मन डर, भौ अर ग्लानि सूं भरग्यो।

राधा प्रकास रै सिराणै आयनै बैठगी। प्रकास रा बालां मांय आंगळी उळझाय नै हाथ फेरण लागगी।

‘माथो दुखै तो दाब देवूं।’ राधा घणै मिठास सूं बोली।

‘ना, तू सोज्या!’ प्रकास ऊथलो दीन्यो।

‘पग दाबू!’ राधा फेरू बूझयो।

‘ना कीं कोनी दुखै!’ प्रकास समझ फेरूं ऊथलो देय दीन्यो।

‘आछयो नींद आवै तो बत्ती बुझायदे अर सोज्या!’

कैय नै राधा तळै बिछायोड़ा आपरा बिछावणा मांय आयगी।

राधा धरत्यां एक कामळ बिछायां’र एक ओढ्यां, भींत सूं सिर लगायां बैठी रैई। पौ री सरदी मोकळी पड़ रैई। रैय-रैय नै राधा नै धूजणी छूट-रैई। उणनै रुतकाळ रो चोथो दिन। तळै बिछाई अर ऊपर ओढ़ी कामळां सूं सरदी से पूरो जाबतो नीं होय रैयो।

उणरै नेड़ैई प्रकास रो पिलंग। राधा री थर-थरी कांपती देह नै प्रकास देखी, पण कीं नीं बोल्यो। बो हाथ रे सारे लाग्यै स्विच ने दाब’र बत्ती बुझाय दीनी अर किणी आगम रा बिचारां मांय उळझग्यो। आगम रे पड़दै माथै काळस छायोड़ी, कीं सूझे नीं’क के होवैला।

रात रा बारा बजग्या। सरदी सूं धूजती रात री सून्याड़ सांय-सांय कर रैई। प्रकास रो माथो सोचतां सोचतां थाकग्यो। जद, वो पसवाड़ा बदळतो-बदळतो नींद नै बुलावण रा विफल जतन करण में लागग्यो। पण, नींद आज प्रकास सूं इतरी दूर’क आवतां आवतां दिन ईज उग जाय। फेरूं, उणरो दिमाग किसी अणजाण्या विचार-मारगां में गमग्यो।

राधा नै नींद नी आय रैई। स्यात् बा कल्पनालोक रा रंग रळ्या निजारा देख रैई, अर किणी अणजाण्यै सुख मांय डूब रैई। भळै एक लाम्बी सी सांस सागै पीड़ है जाण्यै-पिछाण्यै सागी लोक मांय आय रैई। विधवा नै सुपनां में सुख कठै?

प्रकास बिचारां मांय डूब्योड़ो हो’क अचांचूक एक हळकै धमाकै री अवाज कमरै मांय सुणीजी, कान लगाया, पण अवाज भळै नीं होई। फेरूं, किणी री तेज-तेज, घुटी-घुटी सांसां चालती सुणीजी।

‘राधा! राधा!!’ बत्ती चासतो थको प्रकास बोल्यो—

‘देख्यो, राधा खूणै मांय लुढ़की पड़ी। पीड़ रै गहण में गै’ईज्यो चंद्रमुख, मींचिजिया नैण, दोनूं हाथां री बंदमूठ्यां, अकड़ेड़ो सरीर अर भिच्या जबाड़ा मांय सूं रुक-रुक कर चालती सांसां। प्रकास फक धोळो पड़ग्यो। बो नीं सोच सक्यो, अंबार-अंबार री राजी-खुसी राधा है अचांचूक कै होयो?

ऐकर भळै राधा नै हेलो मार्‌यो। बेहोस राधा खनै ऊथळो नीं। घबरायोड़ी औस्था में प्रकास राधा रो शरीर झकझोर नाख्यो, पण, राधा नै होस को होयोनी।

प्रकास सुण राखी, लुगायां कदे-कदे बेहोस होय जावै। पण, बेहोसी री हालत में किसी लुगाई नै नीं देखी। बो भी जाणतो’क इण बेहोसी नै हिस्टेरिया रा दोरा कैवै। बो सुणी बातां रै आधार माथै राधा री नाक अर मुण्डो भींच लीन्यो। दोय मिनट पछै ऊणरी दोनूं मुठ्यां खुलगी अर बा प्रकास रा हाथ नै अळगो करण री चेष्टा करती आंख खोल दोनी।

‘राधा..!’ प्रकास धीरै सी कैयो।

राधा बेचेन आंख्यां सूं प्रकास खानी देख्यो। प्रकास उण आंख्यां मांय एक अजब भूखी-भूखी दीठी देखी।

राधा री आंख्यां नसो करेड़ी सी मदहोस होय रैई। प्रकास उण में जुवानी रा मद भर्‌या सुपनां सूं रचियोड़ा सुनैरा, अर ऊंचा, अर गिगनार चढ्या रंग महलां रा सुपना देख्या। अरमानां, अंछावां री उजड़ती बस्ती देखी अर जाणै ओर के-के उण आंख्यां मांय रम्योड़ो—

‘तबियत कियां है अबै?’ प्रकास उणी’ज तरै देखतां थकां बूझ्यो।

राधा भळै आंख्यां मींच लीनी। प्रकास रै हाथां नै काठा अपड़ लीन्या। आपरै गरम-गरम धड़कतै काळजै खानी खींचती गई, खींचती गई इतरी जोर सूं’क जाणै प्रकास नै आपरै सरीर मांय एकूंकार कर नाखैली। दूजो हाथ प्रकास री नाड़ ऊपर सूं नाख’र होठां सूं होठ अड़ा दीन्या। प्रकास री धड़कणां तेज होयगी। वो चुपचाप राधा रा बंधणा में बंधतो गयो। विरोध नीं कर सक्यो।

एकर, खानी इतरो कैय सक्यो प्रकास ‘होस संभाळ राधा, बावळी मत बण।’

पण, राधा चुप रैई। खाली उणरो बंधण काठो होवतो गयो। उणरै सरीर मांय सूं एक अजब, मदहोस करण हाळी सुगंध निकळ रैई।

राधा री भूखी, जाचणां भरी आंख्यां प्रकास री आंख्यां मांय गड़गी। प्रकास री आंख्यां डूबूं-तिरूं डूबूं-तिरूं होयगी। गळो सूखग्यो। जाणै उण मांय कदे थूक नीं रैयो होवै।

प्रकास सोचण लाग्यो, राधा जुवान है, पण जुवानी रो रसभोग कदे ना कर्‌यो। राधा रै हिवड़ै मांय तिरस्या अरमान है रंगीन रातां रा सुपनां है भूखी अंछावां हैं जुवान पुरस रै आसरै री मुधरी वासना है अर प्रकास सोचणो तो सरू कर्‌यो, पण सोच नीं सक्यो। आपरी बुसक्यां नै थामण री बिफल चेष्टा करतो, बो राधा रै असहाय बंधण मांय बंध्यो रैयो, के कैय नै बो राधा नै सांत्वना देवै, के कैय नै उणनै थ्यावस’र धीरज बंधावै, आगम है किस्यै खूणै में मुण्डो ल्हुकोय नै रैवण’रो आस्वासन देवै?

फेरूं, इसी आंधी आई’क सोकीं धुंधळको पड़ग्यो अर आंधी री सांय-सांय माँथ कीं नीं सुणी’ज सक्यो? आसंकावां घणी कमती बार झूठी होवै। प्रकास री आसंका उण कमती री गिणती मांय नीं आय सकी।

दिनूगै, जद दोनूं उठ्या, दोन्यां रा मन ग्लानि सूं भर रैया।

प्रकास पछै जैपर सूं आयग्यो। राधा रा कागद बरोबर आवता रैया। पै’ली-पै’ली तो उण कागदां मांय लिख्यो होवतो’क “फेरूं मिलांला के?” कीं दिनां पछै, जिका कागद आया उणमांय लिख्यो होवतो’क “ढंग चोखा नीजर नीं आवै। अणहोणी होय जावैला। एकर मिलै तो बतावूं।’ इणरै पछै कागद नीं आया। कई दिनां ताणी कागद नीं आया।

अर, पछै, आज कागद आयो, जिकै मांय लिख्यो’क ‘फेर मिलांला प्रकास, फेर मिलांला!’

रात भर प्रकास राधा रै बारे में सोचतो रैयो। अबै जद सूर उगाळी मांय आयग्यो जद, एकर भळै उण कागद नै उठाय नै बांच्यो। लिख्यो—

प्रकास,

तनै अनेकूं कागद दीन्या। एक रो ईज ऊथलो पाछो कदेनीं बांच्यो, अबै फेर कदे कागद नीं आवैला म्हारा, अंतिम कागद लिख रैई हूं। इणरै थारै खनै पूगतां-पूगतां म्हारी जीवण-लीला खतम होय जावैली। दुनिया जीवण कोनी देवै। मर-मर नै जीवणै सूं तो एकदम मर जावणो ठीक समझयो। तेरी निसांणी नै भी सागै लेय जाय रैई हूं। तनै कागद लिखनै सैन में समझायो’क ‘अणहोणी होय जावैला पण, तो तू मिल्यो अर थारो कागद! अबै हार रै दरजै कागद लिख रैयी हूं’ म्हारो अंतिम कागद बांच’र दुख मत ना करी अर घिरणा भी मत ना करी। लुगाई आपरो आपो देय चुकै तो पछै उण खनै रैय भी के जावै। मैं थारै चरणां में सो कीं अरपण कर चुकी, म्हारी भावनां नै जमा राखी। दुनिया में लुगाई जात नै के-के भुगतणो पड़ै, इणरो अनुभव सीख’र जाय रैई हूं। कागद नै, इणनै फाड़’र फैक देई। मैं तो लोगां रै सामैं म्हारो काळो मुण्डो करा लीन्यो, अर जमारै री सेत चादर नै कळमस सूं रंग लीनी। तू कदे इसी मत कर जाई। ढ़क्या भरमां नै ढ़क्या राखी। पापां माथै पड़दो चोखो। अच्छ्या विदां! कदे, फेर मिलांला प्रकास, फेर मिलांला!

तेरी कोई,

राधा

स्रोत
  • पोथी : राजस्थान के कहानीकार ,
  • सिरजक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • संपादक : दीनदयाल ओझा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर ,
  • संस्करण : द्वितीय संस्करण
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