खळळ खळळ करती नदी बैय री, ऊगता सूरज री किरणां सूं चमक चमक करती लै’रां एक दूजी रे पाछै भागी भागी जाय री। जांणै होड़ लगाय री व्है के कुण आगै निकळै।

नदी रा किनारा ऊपरली सिलाड़ी पै कपड़ा पछांटतां धोबी री नजर नदी रा पाणी में बैवती कोई चीज पै पड़ी जो सूरज री किरणां में चमकती धीरै धीरै बैवती आय री।

कनें ही चांपो कुम्हार माटी खोद रियो, धोबी हेलो मारयो, “देख तो कांई बैवतो आवै?”

दोई जणां ऊभा व्हे देखण लाग्या, “है कांई? पींजराधट्टी कोई चीज बैवती आय री है, ईन काढ़ां।”

धोबी बोल्यो, “पींजरो तो म्हारो, मांयने जो चीज व्है वा थारी।”

चांपो अर धोबी लंगोट बांध दोई पाणी में कूदया, रस्सो घाल, खैचनै किनारा पै लाया, सोना रो काम व्हीयोड़ो पींजरो। पींजरो खोलै तो मांयने रुई रा पैल में दबायोड़ी टाबरी, दो च्यार घड़ी री जनम्योड़ी, जांणै गुलाब रो फूल व्है। “हाय, हाय, कुण हत्यारो है? है तो मोटा घर री पण बैवाई क्यूं?”

चांपो कुम्हार टाबरी ने उठाय छाती रे लगाई, “भगवान री इच्छा है, म्हारी नपूतिया री भगवान ने गोद भरणी ही।”

“पींनरियो धोबी लियो, सोरठ लई कुम्हार।”

कुम्हार लेजाय कुम्हारी री गोद में दीधी।

“ले भगवान भेजी है, पाळने मोटी कर।”

कुम्हारी छाती रे लगाय लीधी, छाती में मोह सूं दूध उतर आयो। आख्यां री पलकां ज्यूं ईने राखै।

सांचोर रा राजा रायचन्द देवड़ा रे घरै मूळ नखतर रा पैला पाया में बेटी जनमी, ज्योतसियां कह्यो, “बाप रे अनिष कारक है।”

राव अहैड़ै नीसरिया, साम्ही मिली छै धाय।

मूळां जाई डीकरी, नदियां देवो बैवाय॥

राव तो मूळां जाई डीकरी ने नदी में बैवाई पण चांपा कुम्हार रे आंगणां में आणंद उतरग्यो। दोई मोटयार लुगाई पल पल मुंहगी करै, वांरी बरसां री आसा, कदे ही वांरा ही आंगणां में, “भूख लागी, भूख लागी” करतो टाबरे पगां ने पटकतो घूघरिया बजावतो रोवैला, पूरी व्हीं। “मां” सबद सुणबा री भूख कुम्हारी रा काळजा ने चूंटती रैती, टाबरी ने पल्ला नीचै ढांकनै मूंडा में बोबो घालती वा निहाल व्हेगी।

चांपो पालणां में हुलरावतो बोल्यो, “आखा सोरठ देस में फिरजा जो थंने असी रुपाळी कोई लाध जावै तो। सारा सोरठ से रुप भेळो व्है में आयग्यो है।”

नाम राख्यो सोरठ। सोरठ तो मोटी व्है सुकल पक्ष रा चांद री नांई, घड़ी बधतां पल वधै। कुम्हार री झूंपड़ी में जांणै चांद पवास्यो।

चांपो ज्यूं सोरठ मोटी व्है ज्यूं वींरी घणी सम्हाळ राखै। बारणै मांयनै नीं आवा जावा दे। कुम्हारी ने समझावतो रै,

“देख कठैई कोई मोटा राजवी री नजर सोरठ पै नीं पड़ जावै। नीं तो आंपणो अभाग व्हे जावैला, सोरठ ने मांग लेगा, खोस लेगा। थूं ने घर बारै मत निकळबा दे।”

दूध अर पूत ही कदे ही छिपायां छिपै के?

पोळ री थेळी कनें दूजी कुम्हारां री छोरयां साथै सोरठ ऊभी। अतराक में गिरनार रो राव खंगार बींझा ने लारै लीधां सिकार खेलतो खेलतो वीं गैले व्हेने निकळयो। बींझा री नजर सोरठ माथै पड़ी, दृष्टि डिगायां डिगै नीं।

सोरठ थानें देखिया, जाझा झूलर मांहि।

जांणै चमकी बीजळी, गुदलै बादळ मांहि॥

बींझा तो वठै रो वटै लट्टू व्हेग्यो। राव खंगार रो घोड़ो बीस कदम आगै

निकळयो, पाछै फिरनै झांकै तो बींझौ अटक्यो ऊभो। घोड़ो पाछो मोड़यो। राव खगार नै आता देख बींझो सोरठ साम्ही आंगळी करतो बोल्यो,

कुम्हारां री डीकरी, ऊभी मांड तळांह।

बींझो पूछै राव ने, कहो तो मोल करांह॥

अतराक में कुम्हारी आई, सोरठ ने पोळ में ऊभी देखी, बारै घोड़ा सवारां ने देख्या, झट सोरठ रो बावंटयो पकड़ नै खैंच लेगी।

आव परी कै जाव परी, अधबिच ऊभी कांह।

कोयक गरास्यो देख सी, कळंक लगावै मांह॥

जाती जाती सोरठ रो पळाको राव खंगार ने पड़ग्यो। माथो धूण लीधो। बींझो कह्यो “ई ने मूंडै मांग्यो धन दे मोल लेलां।”

खंगार हूंकारो भरयो। बींझै जाय नै चांपा ने कह्यो। चांपै जबाब दीधो, “परथी रो राज दे दो तो ही म्हने बेटी बेचणी नीं।”

राव खंगार बोल्यो, “बेच मत। म्हूं गिरनार रो राजा हूं म्हंने परणाय दे।”

चांपै कुम्हार हाथ जोड़्या, “सगपण आपरा बरोबरियां सूं चोखो लागै, आप राजा म्हूं कुम्हार, आपने परणाय दूं तो काले म्हारी बेटी ने वींरी सोक्यां मोसा बोलै “दूरी रै कुम्हारी री छोरी।” वास्ते परथीनाथ म्हूं तो म्हारी छोरी ने म्हारा जसी जात वाळा ने ही परणावूंला।”

बींझै घणो ऊंचो नीचो लीधो पण चांपो मान्यो नीं। दोई मामा भाणेज गिरनार आडी ने चाल्या पण बींझा रे काळजा में तो सोरठ री तसवीर कोरणी आयगी। असी ऊंडी उतरगी के काढयां कढ़ै नीं। रात दिन सोचतो रैवे किस तरै सोरठ ने लावूं।

चांपा कुम्हार ने सोच लाग्यो, अबै सोरठ ने परणाय देणी। चोखो घर वर देखतो फिरै। भाग री बात बणजारां रो राव रुड़, सांचोर आय निकळयो। लखपति बणजारो, मोकळो धन, आगै दीधा पाछै पड़ै। “झाड़ भंजण” जींरो विड़द लाख पोठी लारै लदै।

चांपै मन में विचार्‌यो ने सोरठ ने परणाय दयां, बैठी राजस करैला। रुड़ ने परणावारो कह्यो। सोरठ जसी नार ने कुण नटतो। राव रुड़ रे लारै ब्याव कर दीधो। रुड़ जीं रो जीं वगत काठ रो जाळीदार पींजड़ा घट्टो मे’ल बणायो, जीरे पैड़ा लगाया। वीं मे’ल में सोरठ ने बैठाई। जठै आप जावै जठै लारै रो लारै, पींजड़ा जस्या में’ल रे बैल्या जोताय साथै लीधो फिरै।

बींझा ने खबर लागी सोरठ रे ब्याव री। मन में राजी व्हीयो खैर बणजारा तो फिरता ही रैवै, कदी कदी तो गिरनार आवैला हीज।

छै मींना व्हेग्या, सोरठ रुड़ रे लारै गांव गांव पैड़ा वाळा मे’ल में बैठी फिरै। गिरनार रो तरझंगर जंगळ, झाड़ी सूं झाड़ी अड़ री। खळ-खळ करता झरणां झर रिया। पहाड़ में बब्बर ना’र डक्कर रिया। गिरनार रा पहाड़ पै टम टम करती साधुवां री सैंकड़ां धूणियां बळ री। ऊंचा रुंखड़ा पै हजारां दम दम करता आग्या (जुगनू) डाळ सूं वी डाळ पै उड़ उड़नै बैठ रिया। आधी रात रो वगत, बणजारा रुड़ री बाळद आय री। बैल्यां रा गळा में बंधी लगी घंटियां झणण झणण करती जाय री। रमझम रमझम छांट पड़ रिया, बींझो ऊंचो माळिया में सूतो पण आंख्यां में नींद नी, सोरठ री तसवीर रै रै नै आंख्यां आगै आय जावै। बैल्या री घंटियां रो झणकारो सुण बींझो आदमी भेज्यो खबर लावा ने, आधी रात रो कुण आयो।

आदमी खबर लायो, बणजारा रुड़ री बाळद आई। बींझो सूतो ज्यूं रो ज्यूं ऊभो व्हेग्यो, खंगार रे में’लां चाल्यो। खंगार पोढ रियो, परधान सींहो पोळ पै बैठयो।

बींझो तो जाय राव खंगार ने झंझेड़या, “बधाई बगसो, राव रुड़ आयो।”

राव खंगार कोटवाळ ने बुलाय हुकम दीधो “बाळद ने आछी जगां डेरा देवावो, तम्बू ताण दो, आछी सरभरा करो।”

वठी ने तो बणजारा रा डेरा लाग रिया, सरभरा व्हेय री, अठी ने बीझा ने सारी रात नींद नीं आई। कदी दिन ऊगै अर कदी जावूं।

पोह फाटतां सोरठ री नींद जागी, उठ’र जाळीदार काठ रा मे’ला में बैठगी।

वींज वगत बींझो बणजारा रे डेरे पूग्यो। बींझा री नजर सोरठ सूं मिली, चो नजर व्हीया। बींझो तो पे’लां ही घायल व्हीयोड़ो हो, सोरठ ही आपो भूलगी। एक दूजा ने देख्यो अर एक दूजा रो व्हेग्यो, ऊमर भर सारुं। एक दूजा री आंख्यां में मन री सारी पोथी बांच लीधी पण तीसरा ने खबर पड़ी नीं।

बींझो, आछी तरह सूं रुड़ वणजारा री खातरी कर में’लां आयो आय अरज करी।

“सोरठ ने लेवणी व्है तो बणजारा रे लारै चौपड़ खेलां।”

राव खंगार वात मानी, रुड़ रे लारै घणी वातां चीतां व्ही, चोपड़ री बाजी जमी। राव खंगार चोपड़ खेलै अर बींझो पासा फेंकै।

खैलतां खेलतां बणजारा रो सारो माल सोरठ रा पींजड़ा सूधी जीतग्यो।

बींझो जीत्योड़ा माल ने लेवा बणजारा रे डेरे चाल्यो।

माल तो सारो राव खंगार रे मे’लां पूगतो करायो अर सोरठ से पींजड़ो आपरे मे’लां रवाना कीधो।

मे’लां री चांनणी पै ऊभो ऊभो राव खंगार देख रियो, सोरठ रा पींजड़ा ने बींझा रा मे’लां साम्हा जावता देख ने हुकम दीधो, “यो पींजड़ो म्हारा में’लां में लावो।’

बींझो मूंडो देखतो रैग्यो, सोरठ रो मूंडो उतरग्यो। राव खंगार देखै तो पींजड़ा में सोरठ बैठी जांणै इन्दर लोक सूं अपसरा उतरनै आई व्है। खंगार री खुसी रो हिसाब नीं।

बींझा ने कह्यो, “बणजारा सूं जीत्योड़ो सारो धन थारो, यो पींजड़ो म्हारो।” बींझो तड़फग्यो।

“सारो जीत्योड़ो धन आप राखो, म्हंने तो पींजड़ो दे दो, म्हारे तो पींजड़ा, मांयलो धन चावै और कांई नीं चावै।”

राव खंगार मान्यो नी, सोरठ ने आपरै रावळा में भेज दीधी।

बींझो मन मार दरबार में जाय बैठयो।

ऊंचो गढ गिरनार, आबू पै छाया पड़ै।

सोरठ रो सिणगार, बादळ सूं वातां करै॥

ऊंचा गिरनार रा, ऊंचा गढ़ में बैठी जद सोरठ सिणगार करवा लागती तो वायरा रै लारै उड़या जावता बादळा ही गैला में दो पल सोरठ ने देखवा ने रुक जाता।

सुपारी रा रंग जसी सांवळी सोरठ रा लूंगां जसी चरपरी देह गन्ध सूं तर व्हीयोड़ो वायरो, गिरनार री सारी बणराय ने मैहकातो बैवा लागतो। सोरठ रा रुप री महक सूं सारो गिरनार पहाड़ सुगंधित व्हेग्यो।

सोरठ रंग री सांवळी, सुपारी रे रंग।

लूंगां जेड़ी चरपरी, उड़ उड़ लागै अंग॥

सोरठ रा झांझर री झणकार सूं गढ़ धूजवा लागतो, गिरनार पहाड़ गाज उठतो। झांझर रा घूंघरा रा झणकारां सूं मे’लां री भींतां गूंजवा लागती।

सोरठ गढ़ सूं ऊतरी, झांझर रे झणकार।

धूज्या गढ़ रा कांगरा, गाज्यो गढ़ गिरनार॥

सोरठ रा रुप ने देख ने कुण थिर रै सकतो?

सोरठ सिणगार करनै गोखड़ा में चढ़ती तो गिरनार रा गढ़ रा कांगरा एक टक देखता रै जाता, गिरनार पहाड़ आपरी चोटी ने ऊंची कर झांकवा लाग जातो। बिरछ झोला खाय आंपणां पानड़ा ने सरावणां रा सनेसा दे दे गोखड़ा में उड़ाय देता।

बिरछां रा कांधा पै लटक्योड़ी बेलड़यां डाळां ने गाढ़ी पकड़ लटूंबण लागती। आंबा रा मोड़ां रा रस पीवता भंवरा ही मींजरां छोड़ वठीने भणणाटा लेवा लाग जाता। सोरठ रे रुप में अस्यो आकरसण हो जो देखवा वाळो एक दांण चेतो खोय देतो। बाणियां वैपार करणों भूल जाता, करसां रा हाथ सूं बळद छूट जाता।

सोरठ गढ सूं उतरी, कर सोळा सिणगार।

बणज गमाया बाणियां, बळद गमाया गंवार॥

सोरठ बैठी राजस करै, राव खंगार हुकम हुंकम करै, पल पल पाणी उतारै। सोरठ रा मन में तो बींझौ बैठयो लगो। राव खंगार सोरठ ने लारै ले घणा रंग राग करावै, गोठां माठां करावै, रात दिन आणंद करै। राज काज रे काम ने भूल राख्यो। यूं करतां करतां छै मींना व्हेग्या। राव खंगार ने बारै मूंम पै जावणो, अतरा दिन तो टाळया पण जावणो ही पड़यो। जाती वगत सोरठ ने पूछयो,

“थारो जीव किस तरह लागैला।”

सोरठ उदिया ढोली ने मांग लीधो के ने हुकम दे जावो जो म्हारी ड्योढ़ी पै गाणो करबो करै।

राव तो मूंम विदा व्हीया मै बींझा ने पाछलो काम सूंप्यो, कूंचियां जनाना री सूंपी। राव चाल्या। बींझा रो जीव उथल पुथल व्हे रियो, दिन में सौ सौ निसासा न्हांके। सोरठ सूं बात करवा ने उमगायो रैवै पण ओसर लादै नीं।

सोरठ डाळी अंब री, ऊगी विखमी ठांय।

बींझो बंदर हो रियो, कद टूटे कद खायं॥

बींझा रा भाग सूं एक दिन डाळी टूटी। सोरठ बैठी माथो गुंथाय से। उदियो ढोली ड्योढी पै माद रा दूहा देय रियो। सोरठ री नजर दरवाजा पै बैठया, जोबन में छक्या बींझा पै पड़ी। एक बुलावो भेज्यो, दूजो बुलावो भेज्यो। बींझो आयो। सोरठ बोली,

बींझा म्हाके आंगणां, नित आवो नित जाय।

घट की वेदन बालमा, तो सूं कही जाय॥

बींझै आपरा मन री दसा बताई,

वेदन कहां तो मारिजां, कहतां लाज मरांह।

म्हे करहा थे बेलड़ी, नीरो तोही चरांह॥

सोरठ बोली, “राव खंगार म्हंने चोपड़ में जीती तो कांई? जीत्यो तो म्हारो सरीर ही। पण म्हारा मन ने जीतवा वाळा थां हो। सरीर रो धणी मन रो मालक नीं बण सकै, मन रो मालक सबरो मालक व्है।”

बींझा ने लाग्यो जांणै आकास सूं अमरत री बरखा व्हेय री। निहाल व्हीयोड़ो बींझो सोरठ रा हाथां ने हाथां में झाल लीधो।

सोरठ खुलासा, कीधो, “आखी ऊमर निभावो तो हाथ पकड़जो।”

बींझै सूरज ने साक्षी कीधा, “जीवतो तो थारा सूं बीछडूं नीं मर जावूं तो दोस मत दीजे।”

दोई जणां सूरज ने अर भगवान ने साक्षी कर, मन रो गठजोड़ो बांध आत्मदान दीधो। परतग्या लीधी, “एक दूजा सूं अळगा कदे नीं व्हां।”

वा! बींझो तो अस्यो रमियो के फिरै नै सोरठ रे मे’लां मे जावे। सोरठ उमगी बैठी जोवै। बींझा रो तो सोरठ रा मे’लां में आवणो व्हीयो नै उदियै ढोली दूहो दोधो,

बींझो बाळक डावड़ो, हिलयो बागां जाय।

डाळ मरोड़े रस पिवै, फळ लाखीणा खाय॥

बींझे सुण्यो, सोरठ सुण्यो, दोई जणा दूहा रो मरम समझया एक दूजा साम्हा झांक्या। सोरठ गळा रो हार उतार नै उदिया ढोली ने नीचै फैक्यो।

अबै तो रात दिन बींझो सोरठ रा मे’ल में रैवै। उदियो गावै अर वे रीझां करै। दिन तो ज्यूं जावै अर घड़ी घड़ी पल ज्यूं बीत जावै।

सोरठ अर बींझो तो दूध अर पाणी ज्यूं मिलग्या। फूल अर गन्ध ज्यूं एक जीव व्हेग्या। एक मन दो सरीर।

वे जाणता हा कस्या खतरा सूं वे खेल रिया है, कदे ही बींझो गळ-गळों व्हे सोरठ ने पूछतो, “थूं सांची बता कठै ही राव रे आयां वांरा भें सूं कमजोर तो नीं निकळ जावैला? म्हारा सोना, कठै ही थूं पीतळ मत निकळ जाजे।”

सोरठ सोना रो टको, पर हत्थ लो परखाय।

खोटा कळजुग वापरयां (राणी) मत पीतळ व्हे जाय॥

सोरठ कदे ही पूछती, “म्हंने भूल तो नीं जावेगा? देखो, म्हारा सूं दूरा तो नीं व्हे जावोला?”

“सोरठ थूं असी ऊंडी गड़गी है काळजा में। जीवतो तो कांई म्हूं मर जावूं नै थूं आय मसाणां में हेलो मारै तो म्हारी भसमी बोल उठैला।”

अस्या समै में उदियो गावतो,

सोरठ थां में गुण घणां, कदियन ओगण होय।

गंदगरी रा पेड़ ज्यूं, रतियन खारो होय॥

सोरठ री तारीफ सुण बींझो बाग बाग व्हे जातो। तपता तावड़ा से तातो वायरो ही सीतळ लागवा लाग जातो। अंधारी रात ही ऊजाळी उजाळी दीखवा लागती। सारो जगत एक घेर घुमेर आंबा रा पेड़ जस्यो दीखतो, जो पाका आंबा सूं लड़ालूंब व्हेय रियो व्है। डाळ डाळ पै तिरपत कोयलां बोल री व्है। रस सूं छाक्या भंवरा मांजरा रै ओळूं दोळूं घूमर घाल रिया व्है। जांणै जगत रो पत्तो कैवतो व्है,

“आंबी रस पीवजो पिलावजो”

पण यो सुख रो संसार कतराक दिनां रो?

अठीने वठीने चरचा चालवा लागी, कानां में वातां व्हेवा लागी। सोरठ रे ही झणकारो पड़यो, चमकी। बींझा ने आयनै कह्यो।

बींझो बोल्यो, “डरपगी? बावळी! प्रेम ही कदे छिपायां छिप्यो है? फूलां री सुगन्ध कदे ही छिपी री है? फूल रे खुलतां ही सुगन्ध ने पवन ले भागै अर च्यारुं आडीने बिखेर देवै तो प्रेम रो पवित्तर फूल खुलै जींरी खसबोई तो दस ही दिसा में फूटयां बिनां किण तरै रै सकै?”

सोरठ वांरा पवित्तर अर गाढ़ा नेह पै सोचती लगी कैवती, “बींझा! पूरबला जनम में आपां रा हाथ सूं कोई मोटो पाप व्हीयो जो जनम में आपां अतरा दूरा पड़या। कोई सराप रे कारण बिछोड़ो व्हीयो।”

जीवण रा अतरा बरस जो दूजां बिना अबार तक गमाया, वां बीत्योड़ा बरसां पै नजर न्हाकता, पछताता लगा मोटो नीसासो न्हांक देता। संयोग रो एक एक पल अमोलक लागतो, अभिलाषा करता या सारी जिन्दगानी यां दिनां री एक घड़ी बण जावै, पण यूं व्हे कठै? संजोग री घड़ी तो पल ज्यूं बीतै अर विजोग रा पल बरसां ज्यूं लांबा बध जावै।

अंधारी रात तारा टम-टम कर रिया, गिरनार पहाड़ रा खाळचा में फूल्या केवड़ा री सुगंध सूं धीमो धीमो बाजतो वायरो गरणाय रियो। उत्तराध सूं बादळा गढ़ रा घुमटां रे अड़ता लगा निकळग्या। घूंसाळा में पंछी, धरां में मिनख सूता पड़या। मंझ रात रो वगत, हिरणी रो तारो गढ़ रा कांगरा री सूध पै चमक रियो। में’लां मांयने हिगळू पागां रा हिंगळाट माथै सोरठ अर बींझो निसंक सोय रिया। कूणां में अतर रो दीवो बळ रियो। मंधरो मंधरो उजास व्हे रियो। चांदी री सांकळां में घल्यो हिंगळाट धीमो धीमो हाल रियो। धीरै धीरै हींडा लाग रिया जींसूं सुख री नींद और ही गाढी नैणा में धुळ री। टूटयोड़ी मोगरा रा फूलांरी चोसरां अठीने वठीने बिखरी पड़ी। सेज में बिछायोड़ी गुलाब रा फूलां री पांखड़यां सूं भीनो भीनो सारो मे’ल महक रियो। सोरठ अर बींझो सुध खोय गाढा सोय रिया। राव खंगार ने देखतां ही पोळ वाळा पोळ खोल दीधी, ड्योढ़ी रो ताळौ खोल दीधो। राव तो सूधा सोरठ रा मे’लां में आया। देखै तो हिगळाट पै बीझो दीख्यो। रीस रा मारयां सारो डील धूजवा लाग्यो। होठ थर थर कांपवा लाग्या। हाथ सूधो कमर में कटार पै पड़यो। कटार खैंच नै दोवां री छाती में मारवा नै हाथ छाती तक पूगनै रुकग्यो। राव ने विचार आयो, “मारयां सूं कांई? में तो म्हारो ही नाम कुनाम व्हेला।”

बींझो मारुं तो भाणजो, सोरठ घर री नार।

जांघ उघाड़यां आंपणी, भूंडो कह संसार॥

हाथ पाछो खैंच लीधो, रीस में भरया थका खंगार वारे सिराणै थांभो हो जी में जोर सूं कटार री मारी तो मूंठ तक कटारो थांभा में धंसग्यो। झाळां निकळती आंख्यां सूं झांक खंगार पग पटकता ज्यूं आया ज्यूं बारै निकळग्या।

सोरठ अर बींझो तो नसा में मस्त व्हीया सूता। वां ने खबर नीं के कुण आयो अर कुण गियो।

दिन ऊग्यो, उठया अर नजर पड़ी तो थांभा में कटारो गड़ रियो राव खंगार रो। “मूंडों धोळो पड़ग्यो, बींझो तो झट पाग रा अटपटा पेचां ने सूधो करतो माथै मेल बारै निकळग्यो। अबै मे’लां में बैठी तो सोरठ झूरै अर बारै फिरतो बींझो तलफै। रात ने जक पड़ै दिन में। मिलै तो मरै, नीं मिलै तो रियो जावै नीं।’

सोरठ रे हिया में तो होळी ऊठै, मूंडा पै दिवाळी बतावणी पड़ै। राव खंगार पूरी नींगै राखै। दोई जणां आप आपरा मन ने समझावा री करै पण पन समझौ नीं। फळ कांई मिलैला जो जांणै, छानो कोयनी, पण मनायो मन मानै नीं। आपस में कीधा कौल याद आवै।

आखर रैवणी आयो नीं, औसर देख बींझो सोरठे कनें आयो। ऊनाळा रा तावड़ा में तपी, झाळां निकळती धरती ने सावण री उमड़ती घटा धपावा ने उलळती आवै ज्यूं बींझो आयो। सोरठ बरसता बादळा ने देख मोरड़ी ज्यूं साम्ही भागी। दो पल सारुं भूलग्या के वे कठै है? कुण है? वांनै औसाण नीं रियो के वारां माथा पै तो नागी तरवार लटक री है।

सोरठ ने चेतो आयो, “बींझा परो जा। ऊभो मत रै अबै अठै।”

बींझो तो पूंगी पै रीझ्या फण हलावता नाग री नांइ माथो हलायो।

“मरणो एक दांण है सोरठ, कोई वगत आय म्हारो गळो ही काट दे तो म्हंने अफसोस नीं। थारी गळबाथ में कोई मार दे तो म्हारी मुगती व्हे जावै। ईं वेळा री तो मोत अंयोड़ी ही मीठी।”

सोरठ साकर री डळी, मुख मेल्यां घुळ जाय।

हिवड़ै आय विलुंबतां हेमाळो ढुळ जाय॥

खैर, राव खंगार ने खबर लागणी’ज ही। सोरठा ने डराई धमकाई।

वीं खंगार रे आगै साफ साफ कैय दीधो, “म्हारो सात सात भव रो पति बींझो। मारो चावै जीवांवो, आप धणी हो, मन व्हे ज्यूं करो।”

अबै सोरठ रो खंगार करै तो कांई करै। सिवाय मारवा रे और कांई कर सकै? बींझा ने तुरंत देस निकाळो देय दीधो। सोरठ री डयोढी पै करड़ा पैरा लगाय दीधा। बींझो देस में घुसै नीं जस्यो परबन्ध कर दीधो। जी दिन सूं सोरठ तो राव खंगार सूं रुसणो कर लीधो। राव खंगार आवै, सोरठ री गरजां करै, मनावै। सोरठ तो बिजळी ज्यूं कड़क नै राव खंगार पै आवै। मूंडा पै तो सावण री घटा ज्यूं उदासी छाई रैवै अर आंख्यां में सूं भादवा री झड़ी आंसुवां री लागती रैवै। उदियो सोरठ री वेदना समझै। बींझा कनें जाय उदियै सोरठ री दसा रो वरणनन कीधो, जांणै सोरठ री आतमा बींझा ने हेला दे दे कैयरी व्है।

सोरठ नागण हो रही, ज्यूं छेड़ै ज्यूं खाय।

आजा बींझा गारुड़ी, लेजा कंठ लिपटाय॥

यो दूहो सुणतां ही बींझो तड़ाछ खायग्यो। सोरठा ने लावा ने उतावळो व्हेग्यो। वीं ने कांई नीं सूझी। एक नबाब हो जीं ने लाळच बताय गिरनार पै चढाई कराय दीधी।

नबाब री फोजां गिरनार ने जाय घेरयो, जुद्ध व्हीयो, बींझो सोरठ ने लेवा री आसा में दौड़यो पण नबाब सोरठ ने आपरा कब्जा में कर लीधी। बींझो कांई करै। वीं नवाब ने जतरो कैवणो हो जतरो कह्यो। जो कुछ वींरी सामरथ में हो सब कीधो पर बींझा रो कोई उपाय नीं चाल्यो। बींझो निरास व्है उन्मत व्हेग्यो, जठीने झांकै जठीने सोरठ दीखै, सोरठ रो नाम ले ले भींता सूं माथो फोड़ै, नबाब रा मे’लां रे नीचै माथो फोड़ फोड़ तड़फ तड़फ बींझो मरग्यो। उदियो बींझा रा मसांण में जाय बैठग्यो। मसांण में बैठयो बींझा सोरठ रा प्रेम गीत गावै।

वठी ने नबाब सोरठ ने लाळच, डरावणो धमकाणो कर सब तंरै सूं हारग्यो। सोरठ रो प्रेम बींझा सारुं अतरो अटळ देख नबाब ही माथो झुकाय दीधो। नबाब सोरठ ने पूछी,

“बोल थू कैवै जठै थनें भेज दूं। राव खंगार कनें, थारा बाप चांपा कुम्हार कने, थूं कैवै तो बिणजारा रुड़ कनें। जठे जावणो चावै बता।”

सोरठ रोवती थकी बोली, “कठेही नीं जावणो चावूं। बींझा रा मसाण में म्हंने भेज दे तो थारी मोटी मैरबानी।”

नबाब पालकी में बैठाय सोरठ ने बींझा रा मसाण में पौंचाय दीधी। आगै उदियो मसाणां में बैठयो गाय रियो। सोरठ ने देखी तो उदियो पुळकित व्हेग्यो, झट गायनै बधाई,

भलां पधारी पदमणी, जहं बसिया बिजचंद।

“थें थांरो’ सत निभायो, नेह निभायो अर वचन निभायो। खम्मा घणी! म्हारी धणियाणी, आज थांनै बींझा रा मसाणां में देख म्हूं निहाल व्हेग्यो।”

सोरठ रोवा लागगी। उदिया ने याद देवाई, “थारो धणी तो कैवतो के म्हूं मरजावूं नै थूं मसाणा में आय हेलो मारैला तो म्हारी भसमी बोल उठैला। ऊदिया! बींझा ने रोय रोय हेलो मार री हूँ वो आय नीं रियों है, थारो धणी कठै गियो? बोलायां बोलै नीं।”

सोरठ सूरज रे, साम्हे ऊभी व्हेगी। प्रार्थना कीधी, “हे सूरज भगंवान! थूं सब देखबा वाळो है, थारां सूं कोई छानैं नीं। जो म्हे बींझा ने मन बचन करम सूं नेह कीधो व्है, जो म्हूँ सुद्ध व्हूं अर सती व्हूं तो थूं अगनी प्रगट का म्हंने बींझा कनें पुगाय दे।”

सूरज री किरणां सूं अगनी प्रगट व्ही। बींझा री भसमी भेळै सोरठ री भसमी मिलगी।

उदियो तंबूरो ले जीवतो रियो जतरै फिर फिर सोरठ बींझा रा जस गीत गांव गांव में सुणावतो रियो।

स्रोत
  • पोथी : माझंल रात ,
  • सिरजक : रानी लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : दसवां संस्करण
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