रुपनगढ़ रा रावळा में अचाणचक सण्णांटो व्हेग्यो। सीळो वाजतो वायरो जांणै तातो व्हेग्यो व्हैं। डावड़यां रा छमछम वाजंता घूघरा थम गिया। गादी पै बैठी राणियां रा मूंडा धोळा पड़ग्या। बायरो करती दासियां री मुट्ठी में वींझणी री डांडी यूं री यूं रैगी।

श्रीनाथ जी रा मंदर में आरती रा दरसण करता राजाजी रा हाथ में बादसा ओरंगजेब रा हुकम रो कागद पकड़ायो। हुकम बांचता बांचता राजाजी री आंख्यां आगै काळा पीळा आयग्या।

हुकम कांई हो, जहर रो प्यालो हो, जींरी घूंट नीं तो गळा नीचै उतारणी आवै अर नीं थूंकणी आवै।

राजकंवरी चारुमती रे साथै ओरंगजेब रा ब्याव रो पैगाम! कोसे पैगाम ही नीं हुकम अर जुल्मी हुकम, तिथि समै सब निस्वै।

एक कानसूं दूजा कान में गी, दूजा सूं तीजा में। मरदां री रीस सूं मुट्टियां बंधगी बूढां रा सरम सूं माथा नीचा झुकग्या। कै तो अपमान री कड़वी घूंट ने नीचो माथो कर गळै उतारणो कै काळ ने नूतणों। रणचंडी री तसवीर आंख्यां आगै फिरगी। कायरां री छाती धड़धड़ करवा लागी। चारुमती सुण्यो, काची केळ ज्यूं कांपगी जांणै बीजळी पड़ी। रीस सूं राती पड़गी।

“बेइज्जती री कोई हद व्है? बादसा लुगायां ने समझ कांई राखी है? वे कोई खेलबा रो खेलकरणो है? इज्जत ही लुगाई रो संसार में सब सूं अमोलक धन व्है। मरजाणों मंजूर पण इज्जत रे साथै। बादसा रो यो जोर जुलम कदे ही मंजूर नीं! नीं!! नी!!!

चारुमती वीफरगी। माथा री नसां तंणगी। छाती में सांस नीं मावै। बाप ने साफ ना केवाय दीधो “मर जावूं पण बादसा ने नी परणूं।”

अपमान सूं दाझ्योड़ा, नीचो माथो धाल्यां, कसक ने काळजा में दाबयां, बाप गळगळा व्हे समझाण लाग्या, “बेटा, थूं केवै जो सारी सांची है पण बता और उपाय कांई है, जो म्हूं करूं? आलमगीर री फोजां में टक्कर लैण री आपां में तागत नीं। वींरी एक पलटण आंपणां सारा सैर ने उजाड़ देला। हजारां घर बरबाद व्हे जावैला। थारा जसी जसी सैंकड़ां बहू बेटयां रांडां व्हे जावैला अर वां पै जो सिपाही जुलम करैला वो तो सोचणी नीं आवै।”

हमेसां अदब सूं झुकी रैती वे आंख्यां आज पूरा जोर सूं तंणगी, हाथ जोड़ नरमी सूं वात करवा वाळी चारुमती, छाती तांण साम्ही ऊभी व्हेगी।

“जुलम, बेइज्जती झेलवा सूं तो बरबाट व्हे जाणों आछो। औरत री इज्जत सारुं थां नीं भर सको तो मत मरो, म्हूं जीवतै जीव कदे ही नीं मानूं।” थां अतरा जणां हाथां में तरवारां लीधां फिर रिया हो, क्यूं नी एक झटको म्हारे माथा रे मारो? सारो झगड़ो ही खतम व्हे जावै।”

हरणी जसी आंख्यां में आंसू भंरयां माथो आगो कीधो।

“थूं नीं जांणै रो नतीजो कांई निकळ ही।” गलानि अर अफसोस सूं राजाजी माधो पकड़ बैठग्या।

चारुमती ने अत दीखै नीं गत। दिन पनरा रैग्या। पैरवा रा गाबा बैरी व्है रिया जांणै खीरां पै लोटै। भींत पै टंग्योड़ा दरपण साम्ही नजर पड़ी। मूंडा रा परतीबंब सूं कांपी काळजो चीरती निकळगी, “यो रुप ही पापां रो फळ है। पै’ली पदमणी ने बाळी, अबै म्हारो ओसरो है।”

लारै री लारै याद आई पदमणी री इज्जत सारुं माथा कटावण्यां वीरां री।

रुम रुम ऊभो व्हेग्यो। “आज वा री वा म्हारा में बीत री है पण मरवा वाळो कोई है? वींरी आंख आगै चितौड़ रा सूरमा चमक गिया। लारै री लार राणा राजसिंघ रीं तसबीर आंख्यां आगै नाचगी जोत-दान रा चित्तरां में राणा राजसिंघ जी रो जीं दिन वीं चित्तर देख्यो हो तो देखती रैगी। कस्यो रोबदार चेहरो, आंजस सूं भरया नेत्र। वांरी वीरता री का’ण्यां, ओरंगजेब सूं अड़वा री बातां वीं घणी दांण उछळते काळजै सुणी ही। राजसिंघ जी रा जस गीत याद आया।’

पदमणी सारुं लोह्यां रा खाळ बैवावा वाळा री संतान राजसिघ म्हारी रक्षा नीं करैला? जरुर करैला? विचार सूं चारुमती री आंख्यां चमकगी।

“वे ब्याव करले तो?” मीठा विचार सूं कुँवरी रा नैण मिंचग्या।

“अस्या सूरमा परताबी पति सूं बत्तो रजपूत री बेटी ने चावै कांई? दो पल दूसरा ही जगत में चारुमती परी गी।

झट कलम ले, राणा राजसिंघजी ने एक कागद लिख्यो, “म्हे आपने मन वचन सूं पति अंगीकार कर लीधा है। आप म्हंने ले जावो। ज्यूं क्रिसन, रुकमणी ने सिसुपाल सूं रक्षा कीधी ज्यूं ही अबै म्हारी करो। म्हूं आपरी व्हे चुकी।

“बोलो, अबै कांई करणो?” दरीखाना में कागद बांच राणाजी सारा सरदारां कानी पूछता नजर न्हांकी।

कीरा ही तो हाथ मूंछां पै पड़ग्या, कीं री ही रीस सूं आंख्यां में सूं झाळा छूटवा लागी, कीरे ही रगत रो संचार बधग्यो। घणकरां रा मूंडा उतरग्या।

“करणो कांई है? जो चौड़े है, वाईजी ने परण पधारो।” एक जणो आगतो बोल्यो।

“आगली पाछली सोच ने बात करो, दिल्ली रा धणी सूं लोहो लेवणो है।” दूजे थोड़ो सोच’र कह्यो।

“दिल्ली रा धणी सूं कटे ही अड़या कोयनी हां कांई। घणो व्हे ही मर जावां, और नवी वात कांई व्हेला?”

बहस मुबाहिसो व्हेण लाग्यो। आप आपरी कैण लाग्या।

“यो काम जाणों जस्यो सोरो नीं है।”

“सवाल लुगाई जाति री इज्जत रो है।”

“घर री तागत देखणी पै’लां जरुरी है।”

“सरण में आया री रक्षा करणों सब सूं मोटो धरम है।”

“राणाजी कह्यो, “फळ रो चावै जो व्हीजो। मरणो एक दांण है, आगै के पाछै। लुगाई री वीणती टाळ दे वो मरद ही नीं। नारी रो अपमान नजरयां देखणों ही सबसूं मोटो पाप है, जीवता जीव नरक भोगण्डे, है। करो फोज री त्यारी करो, म्हूं परणवा ने जावूलां। थां फोज ले, दिल्ली रा गैला ने रोक्यां राख जो, ब्याव नीं व्हे जावै जतरै। खबरदार, बादसा रुपनगढ़ री सीमा में पग नीं देण पावै। सळूंबर रावतजी ने खबर भेजो, मुसाहिबी रो जिम्मो संभाळै।”

एक जणै अठीने झांक हाथ जोड़्या, “अन्दाता! सळूंबर वाळा तो परणनै कालै हीज धरै आया है। वांरा हाथ रा कांकण डोरड़ा ही नीं खुल्या।”

“हूँ” ललाट पै गैरा धणां सारा सळ पड़ग्या, विचार में थोड़ी देर डूबग्या, धीरै धीरै ऊंची गाबड़ कर, घणां टिमरास सूं बोल्या “आपां जीं जोखम ने उठाबा जाय रिया हां वीं ने तो देखो। करतब भाटा सूं ही ज्यादा करड़ो व्है।”

एक लांबी सांस खैंचता राणाजी धीरै मन ही मन में बोल्या, “आंपणां देस री मान मरजादां राखवा सारुं थां कतरा बळिदान कीधा है।” आखी उमर जुद्धां में रैण्यां राणाजी री आंख्यां में ही पाणी आयग्यो।”

सळूंबर रा गढ़ में राग रा फुंवारा छूट रिया। सरणाई में बधावा बनड़ा गाईज रिया। नीचै बैठी ढोलणियां मांड में दूहा देय री ओढणियां मांड में दूहा देय री। ऊपर मे’ल में मखमल री गादी पै मसनद रो सहारो लीधां रावत रतनसिंघ जी बैठया, कनें ही नवी परणी वींनणी हाड़ीजी, लाल परणेतू पोसाक अर लाल हाथी दांत रो चूड़ो पैरयां बैठया। हींगळू री पोट सरीखा लाल होठां री झांई, वीं रुप री राणी रा गालां री लाली ने और ही गैरी कर री। अतर रा दीवां रा झळमळ करता चानणा में, कंचन सरीखो रंग दूणो दूणो दमक दमक जावतो। रावतजी एक टक वांरे साम्हा चोघरिया, जांणै मंतरयोड़ो सांप झोला लेवै। वांरी तिसाई आंख्यां एक ही नजर में आखो रुप पी जावा ने आगती व्हेय री। वे हाड़ीजी साम्हा झांक्या, वीं नजर रो अरथ समझनै लांबी लांबी कैरी री फांक जसी आंख्यां लाज सूं नीची व्हेगी, झींणीं झींणीं पसीनां री बूंदा आयगी। रावतीजी रा लुभाया नैणां रो नसो चोगणो व्हेग्यो। हुकम री बाट में हाथ जोड़यां ऊभी डावड़ी चतरसाळा सूं बारै ख़िसकगी। बारै बैठी डावड़यां कलाळी उगेरी।

कंवळा कंवळा कंवळ सरीखा हाथां ने हाथ में ले नैणां रा प्यालां सूं सारो रस ऊंधाता रावतजी बोल्या, “हाड़ीजी, थें म्हंने मिलग्या, तिलोक री संपत मिलगी। नो निधि मिलगी। अबै कांई नीं चावै म्हंने।”

पडूत्तर देण ने हाड़ीजी रा होठ हाल्या पण बोल निकळया नीं। नैण नीचा कीधां मन ही मन आणंद रा सागर में तिरवा लाग्या।

“थां सरीखो रतन म्हंने मिल्यो देखो मिनख तो कांई देवता ही म्हारा भाग पै ईसको कर रिया है। आवो म्हारा कनें।”

आणंद रा भार सूं हाड़ीजी री आंख्यां आधी मींचणी आयगी। अतराक में तो डावड़ी, हाथ में परवानो लीधां मांयने आई, झुक’र कागद नजर करयो।

यो वगत है? रावत जी आंख काढ़ी।

“खम्मा परथीनाथ। उदैपुर सूं सवार आयो। जरुरी हुकम है ज्यूं ताबेदार हजार व्ही”।

परवानो बांच्यो। जांणै आभा में चमकता चांद पै कालो बादळो आयग्यों व्है, झळमळ करता दिवला री बाती पै गुल आयग्यो व्हे। मे’लां रा हंसता लगा थांभा गुमसुम व्हेग्या। रावतजी रो मूंडो पीळो पड़गयो।

“बात कांई है?” हाड़ीजी हाथ सूं कागद लेतां बांच्यो। काळजो कटग्यो। नैणां में करुणा री देवी जांणै सैंसरीर बिराजमान व्हेयगी। यो अथाग नेह अर विजोग! यो बंधण अर काचा सूत ज्यूं टूटबा वाळो!!

रावतजी बैठया रा बैठ्या रैग्या जांणै पाखाण री पूतळी व्है। घणी देर पछै हाल्या।

“लड़ाई में म्हूं नीं जावूलां।”

हाड़ीजी आंख्यां फाड़यां देखता रैग्या। कांनां पै भरोसो नीं आयो।

“नीं म्हूं नीं जादूं। थांने छोड़ कठै ही नीं जावू।” कांपता कंठा सूं बोल निकळया।

हाड़ीजी समझी, “म्हारो मोह थांने जावा नीं देवै।”

नैणां री कोरां में पाणी भरग्यो। मन तो कहहयो हाथ पकड़ अठै ही राख लूं पण आतमा अंतस सूं धक्को दीधो, रजपूत अर जुद्ध सूं मूंडो फेरे? धिकार!

हाड़ीजी पूछयो, “कांई फरमा रिया हो?”

“सांच कैय रियो हूं। थांने छोडणी नीं आवै।”

हाड़ीजी रो दरप जाग्यो।

“ये सबद आप रा मूडा सूं सुण री हूं? आज धणियां ने, जनम भौम ने आप री जरुरत है।”

“जनम भौम रो म्हूं एकलो बेटो नीं और घणां ही है।”

“आप चूंड़ाजी रा वंसज अर या कायरता? चूंडावतां री बादरी री बातां घणी सुणी। या हीज है नी आप लोगां री बादरी? देख लीधी। कुळ रो मरजादा रो ध्यान है के नीं! आप री सारी पीढयां रण भूमि में सूती आप नट रिया हो। तवारीख् में कांइ नाम मंडेला?

“तवारीख अर मरजादा री बातां थें म्हंनें कांइ सुणावो हाड़ीजी, सब समझूं। कायर कोनी हूं, म्हारी बादरी री बातां सुणणी व्है तो म्हारा खांडा ने पूछो। अबार म्हारो धरम करम, मान मरजादा सब थें हो। सुरग नरक री चिन्ता नीं। म्हंने चिन्ता है थांरी, कोरी थांरी।”

हाड़ीजी सुण्यो। काले असीज नेह री बातां अमरत सूं मीठी लाग री पण अबारुं बळबळता खीरा ज्यूं लागी। वीं ने याद आयगो, वां रे हीज भूवा जोधपुर जसवन्तसिंघ जी री हाड़ीराणी री। वां भाग’र आया पति ने किला में कोनी घुसण दीधा। किला रा दरवाजा बन्द कर दीधा। “भाग्योड़ा पति रो मूंडो कोनी देखूं।”

हाड़ीजी री सांस जोर सूं चालण लागगी, रगत में उबाळो आयग्यो।

“म्हारी चिन्ता मत करो। तरवार हाथ में पकड़ो। जीत’र आया तो अठै आणंद करांला, मरग्या तो सुरग में म्हूं ही लारै री लारै आवूं।’

“कतरा कठोर हो हाड़ीजी थे!”

हाड़ीजी रो आवेग सूं तो मूंडो रातो व्हेग्यो, “कायर पति ने बाथ में घाल नै घर में घाल्यां राखवा सूं तो बीर पति री रांड व्हे जाणो लाख दांण चोखो।”

रावत जी एक लांबी सांस लेता लळचाया नैणां सूं झांक्या, म्हूं तो जुद्ध में खैर जावूं ही हूं पण पाछा सूं थांरो कांई व्हेला। हथळवा री में’दी नीं सूखी।”

हाड़ी तड़फगी, “म्हारो कांई व्हेला? लो यो वचन। आप जो लड़ाई में काम आयग्या तो लारै म्हूं सती व्हे जावूं।”

रावतजी कूच री त्यारी पै लाग्या पण अणमणा मन सूं। तयारी करै पण जीव हाड़ीजी में। घोड़ा पै सवार व्हीया, पाछा फिर फिरनै झांकता जावै। हाड़ीजी रा गोखड़ा रे नीचै घोड़ा री वाग खैंच लीधी। ऊपर झांक्या, परणतू पोसाक में जींरा हथळेवा री में’दी रो रंग ही नीं फीको पड़यो, वे हाड़ीजी झरोखा री जाळी में बीजळी ज्यूं चमकता दीख्या। घोड़ो रुकग्यो। हजूरी ने हेलो पाड़यो, “जा हाड़ीजी ने अरज कर कोई सैनाणी म्हारे खातर लावै।”

रावत जी री आंख्यां गोखड़ा री जाळी सूं आगै नीं डिगै।

हाड़ीजी देख्यो, “यो मोह! ये रण जाय कांई फते करैला? पीढयां रा नाम रे काळो लागवा रा दिन है। उठी ने तो कायर पति रा उमीणां, म्हारी साथण्यां म्हंने सुणावैला, वठी ने चुंडावतां रा ऊजळा इतिहास पै पै’ली दांण यो कायरता रो दाग लागैला। सगळा रो कारण म्हूं। म्हारो मोह ही तो सगळा अनरथ री जड़ है।’ वांने याद आयग्या वे हीज जोधपुर वाळां भूवा, हाड़ीराणी जो आप रा हाथां सूं पेट चीर औरंगजेब री फोज रे लारै जुद्ध कर मरया। “म्हूं ही तो वीं खानदान में जनम लीधो है।” अंतराक में डावड़ी आय हाथ जोड़यां बोली, “अन्दाता आप री सैनांणी मंगावै, लारै ले जावा ने”

“हां दूं थोड़ी वा तरवार झेलाजे।”

तरवार म्यान सूं काढ़ता बोल्या, “अन्दाता ने अरज कर दीजे, या सैनांणी तो ले पधारो जीं में आपरो जीव है वा आप सूं पै’लां जाय री है। अबै आप पाछा पग मत दीजो।’

या कैवतां ही हाड़ीजी तो तरवार ने हाथ में काठी पकड़ आपरी हीज गाबड़ पै जोर रो झटको मारयो। तड़ाक देतां लोहयां रा फुंवारा रे साथै माथो धम्म देणी को जमीं पै जाय पड़यो। जाणै चांद धरती पै टूट पड़यो व्है।

राजसंमद री पाळ ऊपरला में’लां री चांनणी पे राजसिंघजी वांरी राणी चारुमती रे साथै ऊभा। नीचै नजर पड़ैं जतरै तळाव रो पाणी दीखै। ऊपरै पूनम रो चांद चमक रियो, वींरो चलको नीचै पाणी में करोड़ करोड़ रुप धारण कर नांच रियो।

चारुमती उछाव, करुणा अर सरधा री तिरबेणी नैणां में भरयां, राणाजी, ने पूछ री, “हाड़ीजी आप हाथ सूं हीज आपरो माथो काट सैनांणी देय दीधी? पछै”

“रावतजी आपो भूलग्या, वींरा कटया माथा ने केसां री लट सूं आपरे गळा में बांध लीधी। छाती पर वांरो मुण्ड लटकतो रियो। जांणै वांरी आंख्यां में भूत लड़ रिया व्है, दूजो मा’देव रणभौम में उतर आयो। दुसमणां रो गैलो रोकनै ऊभा रैग्या। एक आंगळ पाछा नीं सरक्या, कटकट’र वांरा बटका बटका नीं व्हींया जतरै। अस्यो दृस्य कदे देख्यो नीं, सुण्यो नीं।” भरया कंठा सूं राणाजी सुणायो।

“पछै?”

“पछै कांई? वांरा परताप सूं थां अठै म्हारे कनें बैठया हो।”

चारुमती रो सरधा सूं माथो झुकग्यो, पलकां आली व्हेगी।

स्रोत
  • पोथी : माँझल रात ,
  • सिरजक : पद्मश्री रानी लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार (जोधपुर) ,
  • संस्करण : दसवां संस्करण
जुड़्योड़ा विसै