कड़ड़! बीजळी चमकी, आंख्यां में पळको पड़यो तो पलकां मींचगी। जांणै सारा डूंगरां में लाय लागी व्है। घररर घररर बादळ गाज्या। बिछाणां में दब्योड़ा टाबरां आप री मावां ने काठी पकड़ लीधी। बीजळियां रा सळाका लाग रिया। लारै री लारै इन्दर री गाज! जांणै हजारां हाथी एक लारै चरळाया व्है। वायरो वाजै तो अस्यो के घरां री छातां ने उड़ाय लेजावै, परळै रो रुप कर आयो। हड़ड़ाटा वायरा रा लाग रिया। ढांढा, डांगर बंध्योड़ा, रीकबा लाग्या, खूंटा तुड़ावै, खळभळाटो मचग्यो। घटता में बाकी रैण ने ओळा तड़ातड़ तड़ातड़ पड़ण लाग्या। मोटा मोटा ओळा जांणै भाटा बरस्या। रुंखड़ा माथै बैठया पंछयां रो साथरो बिछग्यो। डूंगर रा जिनावर झाड़ां नीचै जाय जाय माथो छिपायो। पाणी सूं पीटयोड़ा सी सूं धूजता अठीने वठीने लुकता फिरै। जीव जंत सारा बेकळ व्हेग्या।
बरड़ा रा डूंगरां में चारणां रो साथ, आपरे पसुवां ने चरावा ने आयोड़ो हो। डूंगर रा खाळचा में दूरा दूरा आप आपरी झुंपड़यां बांध्या पड़या। ई परळै काळ सा ओळा, आंधी में आप आपरी झूंपड़यां में सै धंस्या बैठया।
पोह रो मींननो। ईयां ही ठंड घणी अर आज रा ओळा मेह सूं तो चोगणी व्हेगी। वासदी सुलगाय तापै। टाबर मावां ने नीं छोड़े। डोकरा, डोकरी बैठया, “राम राम” करता, इन्दर सूं कोप कम करणै री अरदास करै।
अेक झूंपड़ी में अमरो चारण, अस्सी वरसां रो बोझो उठायोंड़ो। हाथ में माळा ले गूदड़ी में धंस्यो माळा रा मणियां सरकाय रियो। फाटी गूदड़ी सूं ठंड किसी जावै? ठंड सूं हाथ धूजतो जावै। लारै होठ हालता जावै। सी मरता ने नींद आवै कोयनी। आधी रात, मंझ आधी रात। घोड़ा री टापां री आवाज आई। डोकरा रा कान व्हीया। ई वैळा अठीने घोड़ो? घोड़ा री पोड़ सुणी, घोड़ा री हीस वींरी झूंपड़ी रा दरवाजा कनें। अचम्भे में आय उठयो। देखै तो घोड़ो बारणा रे माथै टाप मार रियो, हींस रियो।
“कुण व्हैला?”
कोई जबाब नीं। घोड़ा री हींस कोरी। एक धमाको व्हीयो जांणै कोई पड़यो व्है। अमरो झूंपड़ी में जाय हेलो मारयो। “बेटा ऊजळी, उठ बारै आ, म्हंने अंधारा में सूझै कोयनी।”
ठंड सूं कांपती, गूदड़ी फैंक ऊजळी उठी। संटी बाळी, वींरा उजाळा में ऊजळी री काया असी चमकी जांणै काळा बादळां में चांद। बारै निकळ संटी रा चांदणा में देखै तो घोड़ो ऊभो। जींण में सूं पाणी झर रियो, घोड़ा रे पगां कनें सवार गांठ व्हीयो पड़यो। चेतो कोनी, कपड़ा में सूं पाणी टपक रियो, सारो सरीर करड़ो पड़गयो, होठ लीलाय गिया,आंख्यां री पलकां बंद। डोकरै झट वींरी छाती पै हाथ मेलनै देख्यो, सांस तो आयरियो, नाड़ी पकड़ी, जीवै तो है। गद गद पोठयां कर ऊजळी वीं ने झूंपड़ी में लेगी, गूदड़ी पै न्हांक्यो।
“काका, जीवै तो है सवार?”
“जीवै तो है बेटी, पण ठंड सूं अकड़ग्यो। झट वासददी सलगा। ई ने तपावां, न तो मर जावैला। होठ लीला पड़ग्या ईरा।
“लकड़ी तो घर में एक नीं कांई सलगावूं? घर रा सारा गूदड़ा ई ने ओढ़ाय
दीधा।”
अमरा रे ललाट पै चिंता रा सळ पड़ग्या घरै आयो बटाऊ मर जावैला। घोर पाप! सब सूं मोटो धरम ईरी सेवा करणो। वो सोच में डूबग्यो। मन काठो कर ऊजळी रा माथा पै हाथ राखतो बोल्यो,
“बेटी, असवार मर जावैला तो आपां ने नरक में ही जगा नीं मिलैला। ई ने गरमी पूगाणी है। घर में लकड़ी नीं, गूंदड़ों नीं, म्हूं अस्सी बरसां रो बूढो, म्हारा डील में गरमी कठै? एक उपाय है बेटा, थूं जवान है। थारा डील री गरमी ई असवार ने दे तो यो जीवे। थारा कपड़ा उतार, थारा डील री गरमी ईरा देह में साथै सोयनै दे।”
बीस बरस री कुंवारी कन्या बाप रो मूंडो देखती रैगी।
“बेटी यो धरम है पाप नी” नीचो माथो कर ऊजळी आज्ञा मान लीधी।”
अचेत सूता असवार रे दो फेरा खाय इसवर ने साक्षी दे, “आज सूं म्हारो पति या परदेसी असवार” वींरी सैय्या में गरमी देण ने सोयगी।
“थारो उपकार जनम भर नीं भूलूंला” ऊजळी रा हाथ पकड़यां परदेसी सवार कै रियो है।
काल रो परदेसी असवार आज आंपणो, ऊजळी रा अंतर रो स्वामी बणग्यो। काल री आसमान सूं ओळा रा गोळा बरसाती अंधारी रात आज री रुपावरणी रात व्हेगी। ऊपरै आसमान में चांद हंस रियो, नीचै मेहो जेठवो, पोरबन्दर रो राजकुंवार, हंस हंस ऊजळी रा मनन में उजाळो कर रियो।
“आंपणों मिलणो, एक संजोग हो। डूंगरां में पारस पत्थर मिल्यो, वनं में सकुन्तला मिली।”
“सकुन्तला ने भूल दुष्यन्त राजा में’लां में जाय तो नीं बैठ जावैला कठै ही?’ ऊजळी रे मन में वेम आयो।
“में’लां में तो जाय बैठेला, पण ऊजळी राणी रे साथै।’
“चालो आंपां चालां, साथै ही ले चालो।”
“यू नीं। म्हूं थांने परणवां ने आवूंला। हजारां घोड़ां री जान चढ़ाय ढोलां रे ढ़माकै ले जावूंला।”
“लाओ बचन दो।”
बिनां थाम्भा रा आसमान रे नीचै ऊभो व्हे सोगन लेवूं। “म्हूं थांरो जीवतो’र मरयो’ बाथ में घालतां जेठवै परतिज्ञा कीधी। “बोलो, थें ही थांरा सांचा मन सूं परतिज्ञा करो।”
ऊजळी परतिज्ञा कीधी, “म्हूं भव भव में थांरी, थां सिवा संसार रा दूजा मानवी म्हारा भाई, थां परणो नीं परणो पण म्हें थांने पति रे रुप में अंगीकारया। सूरज चांद डिगै तो म्हूं डिगूं।”
सुख रा दिन तो वात करतां निकळै, रातां भागी जावै। मेह नै पांवणा कतरा दिनां रा? एक दिन घोड़ा माथै जींण कसतां कसतां मेहो जेठवो सीख मांगी। ऊजळी हिचक्यां भरती सीख दीधी। जेठवो कोल करग्यो, “एक पखवाड़ा में पाछो आवूंला।”
जेठवो, राजाजी सूं सिकार करणै री इजाजत लेवै, सिकार रे मिस डूंगरां कानी आवै। ऊजळी सूं छानै छानै मिल जावै। दिन में दोय घड़ी ऊजळी री गोद में माथो मेल मन रो नै सरीर रो थकेलो मेटै। रुपावरणी रात में बैठ ब्याव रा मनसूबा बांधै। डूंगर रा वनफूलां रो गैणों बणाय ऊजळी ने सिणगारै। फूल कुमलावै नीं जठा पे’ली, काळजा पै भाटो मेल, आपरे डेरै पोह फाटयां आय सोवै। दो घड़ी रा संजोग में हिवड़ा री वातां करै पण विजोग री नांगी तरवार माथै लटकती रैवै। यूं करतां मींना बीत्या। बात छानै कतरा दिन रैती। राजा जाण्यां, मिनख जाण्यां। राजा रीस में आया। परजा में चरचा चालण लागी।
“चारण री बेटी, रजपूत रे बेन ज्यूं, घोर पाप, हाहाकार मच जावैला।”
मेहा री छाती पड़ी नीं, राजा रो कोप झेलणै री। संसार रे सामै खुली छाती आपरी परतिज्ञा पालणै री हिम्मत पड़ै नीं। मेहो जेठवो आपरा अंतकरण ने कचर मे ‘लां में जाय बैठयो। ऊजळी ने मन में सूं काढणै री कोसीस करै। वठीने ऊजळी बैठी आसा री बेलड़ी में लाख लाख घड़ा सींच जेठवा री बाट जोवै। दिन पै दिन निकळलता गिया। कोई समाचार नीं। घर रो काम अर बूढा बाप री चाकरी छोड़ मारग पै बैठी गैलो देखै। एक दिन देखै, दूरां सूं घोड़ां रो झूमको रो झूमको, जेठवो आतो वीं व्हाला बाट पै खड़ियो आय रियो है। ऊजळी री नस नस में उमंग री लै’र दौड़गी। वींरा मन रा आणंद ने जीभ जोर सूं हेलो मार कैय दीधो,
“वै आवै असवार, घुड़लां री घूमर कियां।”
दोड़’र ऊपर मंगरी माथे चढ, आंख्यां फाड़, जेठवा ने सोधवा लागी। नैणां सूं टळ-टळ करता गालां पे अणबिध्या मोती बिखरग्या।
“अबला रो आधार, जको न दीसै जेठवो”
“हाय, म्हारो आधार जेठवो तो यां में कोयनी” ऊजळी, जेठवा री याद में रात ने तारां सूं वातां करै, दिन में डूंगर रा भांड़ा ने वातां पूछै। असाढ रा बादळा निकळया, मेह री झड़ लागी, मेह रा नाम रे साथै “मेहो” नाम ने जोड़ विलाप करवा लागी,
मोटो उफण्यो मेह, आयो धरती धरवतो।
मुझ पांती रो एह, छांटन वरस्यो जेठवा॥
“ओ मेह तो मोटा मोटा छांटा बरसाय, धरती ने धपाय दीधी पण म्हारो “मेहो” तो म्हारे माथै एक छांटो हीं ना पटक्यो।”
वसंत में लड़ालूंब फूलां ने देख, लपटी बेलड़यां ने देख रोय दीधी। जेठवा ने बुलावा देबा लागी,
फागण मींने फूल, केसूड़ा फूल्या धणां।
मूंघा करोनी मूल, आवी ने आभपरा धणी॥
डूंगरां री खोहां में पसु पंछियां री लीला देखै। सारस चकवा री प्रीत देख सोचै, मानवी सूं तो पंछी चोखा जो आपरी प्रीत तो निभावै,
दुनियां जोड़ी दोय, सारस ने चकवो सुणांह।
मिल्यो न तीजो मोय, जो जो हारी जेठवा॥
दुननियां में प्रीत निभावण्यां कै तो चकवो कै सारस री जोड़ी। जेठवा, म्हूं तो देख देख थाकगी पण तीजो नज़र आयो नीं।
ऊजळी जेठवा रे आणै री आसा छोड़ बैठी। वीं मेहा ने कैवायो, समचार कैवायो, अंतर री वेदना रा गीत, दूहा बणाय भेज्या,
ताळा सजड़ जड़याह, कूंची ले कीने थयो।
खुलसी तो आयांह, जड़िया रहसी जेठवा॥
म्हारा अन्तकरण रे थूं मोटा मोटा ताळा जड़, कूंची ले कठी ने परो गियो। जेठवा, थूं आय, यां ताळां ने खौलैला तो खुलैला नीं तो ये ताळा जनम भर जड़या ही रैवैला।
टोळी सूं टळतांह, हिरणां मन माठा हुवै।
व्हालां बीछड़यांह, जीवे किण विध जेठवा॥
आंपणी टोळी सूं, जोड़ी सूं बिछड़तां, हिरणां रा, पसुआं रा मन ही दोरा व्है। जेठवा, आपरा प्यारा सूं बिछड़यां कियां जीवीजै, थूं ही बता?
थें पटकी पाताळ ऊंची ले आकास तक।
पगत्यो बण पाताळ, जीव उठूं रे जेठवा॥
यूं म्हंने, प्रीत कर, आकास जतरी ऊंची उठाय अबै छिटकाय’र पाताळ में जाय न्हांकी। जेठवा, अबै ही म्हंनै सहारा दे पगत्यो बण जा। म्हूं जीव उठूंला।
चकवा सारस बांण, नारी नेह तीनूं निरख।
जीणों मुसकल जांण, जोड़ी बिछड़यां जेठवा॥
चकवा री, सारस री अर नारी री एक सी बाण है। जोड़ी बिछड़यां पछै ये तीनू ही जीवै कोयनीं।
जिण बिन घड़ी न जाय, जमवारो किम जावसी।
विलखतड़ी बीहाय, जोगण करग्यो जेठवा॥
जीरे बिना एक घड़ी रैणो ही दोरों लागै, वीरे बिना यो जमारो जनम कियां बीतैला? म्हूं बिलख री हूं थूं म्हंने जोगण कर चल्यो गियो, जेठवा!
ऊजळी घणां कळळापा कर कर जेठवा ने भूली प्रीत याद देवाई। जेठवै उतर में कैवायो, “आंपणी जूनी प्रीत भूल जा। घणां ही चारण है, कीरे ही साथै ब्याव कर घर बसा। थूं चारण री बेटी म्हूं रजपूत, आंपां रे तो जात रे कारण सूं भाई बेन रो सम्बन्ध है।”
ऊजळी रे पगां नींचली जमीन निकळगी। सपनां में नीं सोचै जो बात सुणी। “झूठी बात कदै ही नीं। प्रीत रो, जात रे साथै कांई ताल्लुक?”
जिण सूं लाग्यो जोय, मन सो ही प्यारो मनां।
कारण और न कोय, जात पांत रो जेठवा॥
जिण सूं मन लागग्यो, जो प्यारो लागै वो ही आंपणो। प्रीत में जात पांत रो कोई कारण नीं जेठवा।
वीणा जंतर तार, थें छेड़या वीं राग।
गुण ने रोवूं गंवार, जात न झीकूं जेठवा॥
थें प्यार री वीण बजाई प्रीत री राग गाई। म्हूं तो थारी वीं प्रीत ने रोय री हूँ, गंवार जात ने थोड़ी ही झींकूं हूं।
तावड़ तड़तड़तांह, थळ साम्हो चढतां थकां।
लाधो लड़थड़तांह, जाडी छायां जेठवा॥
तरकाळ तावड़ा में रेत रा टीबा पै साम्हा चढतां री गत व्है जो गत म्हारी व्हेय री है। म्हूं लड़खड़ाय री हूं, जेठवा, ई वगत थूं जाडी छायां बण म्हंने थारी छाया दे।
जळ पीधो जाडेह, पाबासर रे पावटै। नानकियै नाडेह, जीव न धापै जेठवा॥
जीं मानसरोवर रो पाणी पी लीधो वींरो जीव तळायां रा पाणी ने थोड़ो ही ढुकै। थारा सूं प्रीत कर जेठवा, दूसरा साम्हें नजर ही नीं उठै।
घणां घणां ओळमा लिख ऊजळी भेज्या, कैवायो पण जेठवा रो भाटा जस्यो मन पिघळयो नीं। कायरा रा काळजा में थीज्योड़ो लोही ऊनो व्हीयो ही नीं उठै।
कैवाई “थंने जात रो विचार नीं है, राज ही चावै तो और घणां ही मोटा मोटा राजवी है, वांने अरदास कर, वे थारी मनसा पूरण करैला।”
ऊजळी रे माथै जाणै वजर पड़यो। रुं रुं सूं रीस री लपटां निकळवा लागी। धिक्कार है। आपरे संगैती चारण खीमरा ने कह्यो,
खीमरा, खारो देस, मीठा बोला मानवी।
नुगरां किसो सनेह, जेठी राण झल्यो नहीं॥
खीमरा, यो देस ही खारो निकळयो। खारा मन रा मिनख, कोरा मूंडा सूं मीठां बोलै। अस्या नुगरां मिनखां सू किस्यो सनेह। जेठवा सूं नेह रो भार झेलणी नीं आयो।
काचो घड़ो कुम्हार, अणजाणेह उपाड़ियो।
भव रो भांगणहार, जेठी राण जाण्यो नहीं॥
अरे म्हूं अणजाण में कुम्हार रा घर सूं काचो घड़ो (काचा मानवी रो प्यार।) उपाड़यो। म्हूं ई जेठवा राणा ने म्हारी जिन्दगानी ने भांगवा वाळो नीं जाण्यो।
परदेसी री प्रीत, जेठी राण जाणी नहीं।
तांणी नै मारया तीर, माथा भर भर जेठवा॥
ई जेठवै म्हारी परदेसी री प्रीत री पीड़ा समझी नीं। वीं तरकस भर भर दुख रा अर जीभ रा बाण म्हारे माथै तांण तांणनै मारया।
दुख सूं दाझ्योड़ी ऊजळी, आभपरा रा डूंगरा में भटकती भटकती पोरबन्दर गी। जेठवा रा मे’लां आगै तीन दिन भूखी अर तिसी बैठी री।
“म्हने एक’र जेठवा थारो मूंडो बतायदे।”
गोखड़ा री बारी खोल जेठवै मूंडो काढ़यो, “थूं थारे जात रा बेटा ने परण ले, आधो राज थंने देयनै बेन बणाय दूंला।”
कनें ही रतनागर संमदर हिलोळा लेय रियो हो। ऊजळी उठी, समंदर री लै’रां में जाय कूदगी।