राजस्थानी फिलमां कमती बणण रौ कारण राज्य सरकार री उदासीनता : दिवाकर
राजू कादरी : दिवाकरजी, आपरी जनम-स्थळी कुण-सी है?
वल्लभेश दिवाकर : म्हारौ जनम बीकानेर में ई हुयौ। पढाई-लिखाई ई अठै इज करी। सन् 1960 में म्हैं बंबई चल्यौ गयौ।
राजू कादरी : फिलमां कानी आपरौ जावणौ किंयां हुयौ?
वल्लभेश दिवाकर : सांची बात तो आ है के म्हनै फिलमां में ले जावण रौ जस तो चावा शाइर अर फिलमी गीतकार कमर जलालाबादी नै है। वां दिनां म्हैं फिलम इंडस्ट्री में हुवण वाळै कवि-सम्मेलनां अर मुशाइरां में जाया करतौ हौ। वठै ई म्हारी मुलाकातं भाई कमर सूं हुई। फिल्मिस्तान स्टूडियो में हर साल री तरै कवि-सम्मेलन अर मुशाइरौ हौ, म्हारा गीत वठै घणा पसंद करीज्या। सम्मेलन रै बाद केई फिलम-निरमातावां म्हारा गीत आपरी फिलमां सारू लेवण नै म्हारै कनै आया। पण म्हैं मना कर दियौ। आ बात जद भाई कमर जलालाबादी नै ठा पड़ी तो वां म्हनै समझायौ। अर वां रै कैयौ बाद ई म्हैं फिलमां में गीत लिखणा सरू कर्या। इण भांत म्हारौ फिलम जगत में प्रवेस हुयौ।
राजू कादरी : आपरै गीतां री पैली फिलम कुण-सी ही?
वल्लभेश दिवाकर : म्हारै गीतां री पैली फिलम ही ‘संस्कार’। इण फिलम रा संगीत-निरदेसक अनिल विश्वास हा। इण फिलम रा दो गीत ‘तेरी हिम्मत में बल भगवान का/ उठे गम का तूफान/डिगने ना देना आन/ चाहे देना पड़े बलिदान’ अर ‘कोई ढोलक बजाए, कोई शंख बजाए’ घणा चावा हुया। आं गीतां नै चावा पार्श्वगायक मन्नाडे गाया हा, आ फिलम सन् 1962 में प्रदरसित हुई। इण में याकूब जिस्या उण जमानै रा दिग्गज कलाकार काम कर्या।
राजू कादरी : फिलम ‘संस्कार’ री सफळता रै बाद आप कुण-कुण-सी फिलमां में गीत लिख्या?
वल्लभेश दिवाकर : निरमाता-निरदेसक धीरूभाई देसाई री फिलम ‘राजा हरिश्चंद्र’ अर कलाकार जयराज-चित्रा री फिलम ‘दीपक महल’ म्हारी दूजी कामयाब फिलमां है। भविस में प्रदरसित हुवण वाळी फिलमां में ‘देखते ही देखते’, ‘जय बाबा रामदेव’, ‘करमाबाई’, ‘जेठ-जेठाणी’ इत्याद उल्लेखजोग है।
राजू कादरी : भारत रा चावा पार्श्वगायक मोहम्मद रफी आपरा गीत किणी फिलम में गाया कांई? उणांरै बारै में आपरा कांई खयाल है?
वल्लभेश दिवाकर : निरमाता-निरदेसक धीरूभाई देसाई री फिलम ‘राजा हरिश्चंद्र’ में म्हारौ अेक गीत स्व. रफी साहब गायौ हौ। फिलम रै इण ‘थीम सांग’ नै जद रफी साहब पढ्यौ तो वां म्हनै कैयौ के इण तरै रै गीतां री आज फिलम-इंस्डट्री नै जरूरत है। सुशांत बनर्जी रै संगीत निरदेसन में रफी साहब इण गीत नै गैराई में डूब’र गायौ। रफी साहब री बुलंद आवाज म्हारै इण गीत नै ‘परवान’ चढायौ। अर गीत रै लोकप्रिय हुवण सूं म्हनै फिलम में घणौ सम्मान मिल्यौ। गीत रा बोल इण भांत हा—“कोई बेचै सोना-चांदी, कोई हीरा-मोती/मैं बेचूंगा मिट्टी, जिसमें जलती जीवन ज्योती/कोई ले लो रे मैं बेच रहा अपनी काया।”
रफी साहब अच्छा गायक हुवण रै साथै साथै अेक अच्छा इनसान ई हा। साची अर नेक बात वे हमेसां कैवता। दूसरां री भलाई करण में सगळां सूं आगै रैवता। म्हैं तो उणां सूं पैली ई मुलाकात में प्रभावित हुयग्यौ हौ।
राजू कादरी : फिलमां में गीतां रौ स्तर लौगलग गिरतौ ई रैयौ है। इण बारै में आपरौ कांई कैवणौ है?
वल्लभेश दिवाकर : आ बात म्हैं स्वीकार करूं के आजकाल हिन्दी फिलमां में अश्लील अर आधारहीण गीतां रौ घणौ प्रचलन हुयग्यौ है। इणसूं युवा पीढी माथै घणौ बुरौ असर पड़ रैयौ है। गीतां रौ स्तर लगौलग गिरतौ जावण रौ मतलब ओ नीं है के अच्छा गीतकारां रौ अभाव हुयग्यौ है। बल्कै पुराणा गीतकार ई श्रोतावां री पसंद रौ खयाल राखतां थका इस्या गीत लिखै। गीतकारां नै डिस्को पर आधारित गीत लिखण वास्तै ई श्रोता ई मजबूर करै। फिलम जगत में तो आज ई अच्छा गीतकार मौजूद है।
राजू कादरी : गीत अर संगीत रौ फिलम में कांई रिस्तौ हुवै?
वल्लभेश दिवाकर : आ बात म्हैं आपनै बतावण आळौ ई हौ। अच्छै गीत रौ प्रभाव बण्यौ राखण खातर मधुर संगीत रौ अभिन्न योगदान हुवणौ घणौ जरूरी है। गीत सदाबहार बणायौ राखण में अच्छी तर्जां (धुनां) रौ ई घणौ फरक पड़ै। इणरै अलावा अच्छी आवाज रौ ई जुड़ाव उणरै साथै हुय जावै तो पछै कैवणौ ई कांई! धुनां मन नै भावण आळी हुवै तो गीत लोकप्रिय हुय जावै। अर जे संगीत अच्छौ नीं हुवै तो बढिया बोलां वाळौ गीत ई पिट जावै।
राजू कादरी : आज तांई आपरा गीत कुण-कुण सा गायक गाय चुक्या है?
वल्लभेश दिवाकर : फिलमां में म्हारा गीत गावण आळा में मोहम्मद रफी, उषा मंगेशकर, मन्नाडे, आशा भोसले, महेन्द्र कपूर, चंद्राणी मुखर्जी, सुरेश राजवंशी, शब्बीर कुमार, अनुराधा पौड़वाल, शकुंतला जोशी, तिलकराज, मोहम्मद अजीज इत्याद उल्लेखजोग नांव है।
राजू कादरी : फिलम-इंडस्ट्री में आ चरचा सुणण नै मिलै के लक्ष्मीकांत प्यारेलाल साथै काम करण सूं इण छेतर में पूछ हुवण लागै। आप इणां रै संगीत-निरदेसन में गीत लिख्या कांई?
वल्लभेश दिवाकर : दरअसल संगीत-निरदेसक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल मैनती है। अच्छी धुनां बणावणी री उणां री विशेषता है। वे गीत रै बोल अर उणरी ‘सिचुअेसन’ नै ध्यान में राख’र तजां तैयार करै। ओ इज कारण है के उणां रौ नांव आजकाल सबसूं अच्छा संगीतकारां में है।
‘रतन-प्रोडक्शन’ रै बैनर तळै निरमाता-निरदेसक रतनकुमार जिका क ‘मदारी’, ‘बंजारिन’ इत्याद फिलमां बणाई; री फिलम ‘देखते ही देखते’ में सगळा गीत म्हारा है अर उणांनै संगीतबद्ध लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ई कर्या है। आ फिलम नजीक भविस में ई प्रदरसित हुवण आळी है।
राजू कादरी : फिलम ‘देखते ही देखते’ रै गीतां रै बाबत की विस्तार सूं बतावौ?
वल्लभेश दिवाकर : इण फिलम रै शीर्षक गीत रा बोल इण भांत है—“देखते ही देखते ये क्या हुआ/ जो होना था वो सब कुछ हुआ” इणरै अलावा “आंख अश्कों भरी, उठता धुआं आहों का/जब से बदळा है रुख, किसी की खुश निगाहों का”, “धुंध ही धुंध है हम धुंध मिटाएँ कैसै/सनसनाती है हवा दीप जलाएं कैसे” अर दूजा दो गीत और है। इण गीतां नै चावा गायक शब्बीरकुमार, आशा भोसले, अनुराधा पोडवाल इत्याद गाया है। वियां इण फिलम रा कलाकार खास-खास कलाकार राजकिरण, टीना मुनीम, मजहर खान, ओम शिवपुरी इत्याद है।
राजू कादरी : कांई आप राजस्थानी फिलमां खातर ई गीत लिख्या है? जे लिख्या हुवौ तो विगतवार बतावौ?
वल्लभेश दिवाकर : हां-हां, लिख्या है। लारलै दिनां ई लिख्या है। म्हनै ई मायड़ भाषा सूं घणौ लगाव है अर म्हैं ई राजस्थानी में लिखिया करूं हूं। पण जद तांई राजस्थानी फिल्ममैकर म्हनै अनुबंधित नीं करै तो म्हैं कांई कर सकूं। अबार-अबार राजस्थानी फिलमां रौ जकौ नवौ दौर सरू हुयौ, उण कारण लगौलग म्हनै अनुबंध मिल रैया है अर म्हैं लगौलग राजस्थानी गीत लिख रैयौ हूं।
राजू कादरी : जिण-जिण फिलमा में आप राजस्थानी गीत लिख्या हौ, उणां रै बारै में कीं बतावौ?
वल्लभेश दिवाकर : ‘बोहरा पिक्चर्स’ रै बैनर तळै निरमाता-निरदेसक रतनकुमार री फिलम ‘जय बाबा रामदेव’, ‘मरुकला प्रोडक्शन’ रै बैनर तळै निरमाता-निरदेसक यू.के. पुरोहित री ‘करमाबाई’ में म्हारा गीत है। दोनूं ई फिलमां लगै-टग सपूरण हुवण माथै है। बौत जल्दी ई दरसकां नै देखण नै मिलैला।
‘जय बाबा रामदेव’ में म्हारा गीत महेन्द्र कपूर, चंद्राणी मुखर्जी अर सुरेश राजवंशी गाया है। इणमें संगीत दियौ है शंभुसेन!
राजू कादरी : फिलमां में गीतां रै अलावा ई कीं लिख्यौ है कांई? यानी के पटकथा, संवाद वगैरा!
वल्लभेश दिवाकर : फिलम ‘करमा बाई’ में गीत तो म्हारा है ई, इणरी पटकथा अर संवाद ई म्हैं ई लिख्या है। म्हनै उम्मीद है के आ फिलम सफळ हुसी।
राजू कादरी : फिलम ‘करमा बाई’ रै गीतां बाबत कीं जाणकारी दिरावौ?
वल्लभेश दिवाकर : इण फिलम में 'कान्हा रे बेगौ आव/म्हारी पत राखण नै आव/ म्हारौ सत राखण नै आव', 'तुम सुणौ जसोदा मात, गूजरी देणै लागी ताना', 'हो जियौ-जियौ म्हारा मदन गोपाळ करमाबाई' इत्याद उल्लेखजोग गीत है। इणां रै अलावा इण फिलम में अेक गीत कौमी अेकता माथै ई है—“अे खुदा, तूं कान्हा नै जा समझा/म्हांरी करमा रौ दुखड़ौ मिटां”।
आं सगळै गीतां री मीठी धुनां तैयार करी है युवा संगीतकारां री जोड़ी—जुगल-किशोर तिलकराज। ‘करमा बाई’ री कथा माथै बणी आ पैली फिलम है अर इणरी पूरी-री-पूरी शूटिंग जोधपुर जिलै रै ‘कापरड़ा’ गांव में हुई है।
राजू कादरी : आपरी दीठ में राजस्थानी में फिलमां कम क्यूं बणै?
वल्लभेश दिवाकर : राजस्थानी में कम फिलमां बणण रौ खास कारण है राजस्थान सरकार री उदासीनता। जकी ई राजस्थानी फिलमां बण रैयी है वे फगत निरमातावां रै बळबूतै माथै ई बण रैयी है। राजस्थान सरकार जे दूसरै प्रातां री तरै सबसिडि, टैक्स-फ्री इत्याद रौ सैयोग देवै तो राजस्थानी फिलमां ढेरूं बण सकै। पण घणै दुख री बात है के आपां रै हाथां चुणीज्योड़ा नुमाइंदा ई आगै आवाज नीं उठावै। आज रै व्यावसायिक जमानै में भावना में बै’र फिलम बणावणौ घणी टेडी खीर है।
राजू कादरी : आप राजस्थानी री पत्रिका ‘माणक’ तो देखता ई रैवौ हौ, इण बाबत आपरा कांई विचार है?
वल्लभेश दिवाकर : ‘माणक’ रौ लगौलग प्रकासण मायड़ नै मान्यता दिरावण रौ कदम है। ‘माणक’ राजस्थानी भाषा री अस्मिता बचावण में बौत बडौ काम सर-अंजाम दे रैयी है। भाषा नीं बचै तो संस्कृति रौ बचणौ ई मुस्कल हुवै। ‘माणक’ मायड़ भाषा नै लगौलग आगै बढा रैयी है। आ बात घणी सरावण जोग है।