राजस्थानी में चोखी सूं चोखी फिलमां बण सकै है
बीकानेर रै देवकुंड सागर गांव में जाया-जनम्या पी. सुंदर रंगमंच अर फिलमां रा चावा कलाकार। आं दिनां आप राजस्थानी फिलमां में ई काम कर रैया है। सन् 1954 में आप सर्वश्रेष्ठ अभिनेता रै रूप में सम्मानित करीज्या अर सन् 1963 तांई आप तीन बार ‘तनेजा अेवार्ड’ ई लियौ।
लारलै दिनां ‘माणक’ रै पाठकां सारू आप सूं आ भेंटवार्ता करी मो. अशफाक कादरी—
अशफाक कादरी : पी. सुंदरजी, आपनै नाटकां में काम करण रौ शौक कियां लाग्यौ?
पी. सुंदर : टाबरपणै में म्हैं रामलीला घणै चाव सूं देख्या करतौ। भांत-भांत रा सांग देख’र म्हारै मन में ई रंगमंच माथै काम करण री हूंस जागी। अर बगत आयौ तद म्हैं ई रंगमच माथै काम करणौ सरू कर दियौ।
अशफाक कादरी : आप जद रंगमंच माथै काम करणौ सरू कर्यौ तद कांई-कांई तकलीफां आपरै सामी आई? रंगमंच माथै आज तांई आप कित्ताक नाटक खेल चुक्या हौ?
पी. सुंदर : नाटकां री गिणती तो म्हैं लगाय नी राखी है, क्यूंकै बखत ई बौत हुयग्यौ है। पण आपनै म्हैं आ बताय दूं क म्हारै खेल्योड़ौ पैलौ नाटक ‘विश्वास’ हौ। इणरै पछै केई नाटक खेल्या, जियां—‘खून-पसीना’, ‘धरती रोती है’ ‘नील की दुल्हन’, ‘श्रवणकुमार’ इत्याद। अभिनय रै अलावा पात्रां रा मेकअप करणा, न्यारै-न्यारै दरसावां रा सेट त्यार करणा, निरदेसण इत्याद दूजी बातां रौ ई पूरौ ध्यान राख’र नाटक नै सफळ बणावण री चेष्टा म्हारी सदीव सूं ई रैयी।
अशफाक कादरी : समाज सूं जुड़्योड़ा हुवण रै नातै आप समाज रै प्रति आपरौ कांई दायित्व मानौ? कदैई इण बाबत ई सोच्यौ है?
पी. सुंदर : बराबर सोच्यौ है। म्हैं जिण इलाकै में रैवूं, वा बस्ती जन-समस्यावां सूं अणूंती घिर्योड़ी है। उण समस्यावां नै दूर करण सारू म्हैं गांव वाळा रौ तन, मन अर धन सूं साथ देवतौ रैयौ हूं। इणरै अलावा जद ई जरूरत पड़ी, म्हैं, नाटक खेल’र हजारूं रिपिया भेळा कर’र सरकारी राहत कोष मांय जमा ई कराया है।
अशफाक कादरी : आप रंगमंच सूं सिनिमै रै परदै माथै किंयां पूग्या?
पी. सुंदर : म्हनै सिनिमै रै परदै माथै लावण रौ जस संगीतकार संभुसेन रै पिता स्व. जमालसेन नै है। जद म्हैं ‘रोशनीघर’ री सेवा सारू सुजानगढ़ जाया करतौ, तद उणां सूं जाण-पिछाण हुई। सन् 1958 में अचाणक उणां रौ बुलावौ आयौ। फिलम ‘पतित-पावन’ रा वे संगीतकार हा अर म्हैं ‘पुजारी’। उण फिलम में म्हारौ काम आछौ रैयौ। पण वा फिलम घणी चाली नीं।
अशफाक कादरी : जद आपरी पैलड़ी फिलम असफळ रैयी तो पछै दूजी फिलम में आपनै काम किंया मिल्यौ?
पी. सुंदर : दूजी फिलम में काम बौत बाद में मिल्यौ। सन् 1966 पं. वल्लभेश दिवाकर रौ कागद आयौ क धीरू भाई फिलम ‘मां के आंसू’ री शूटिंग खातर बीकानेर आय रैया है। उणां सूं मिलणौ हुयौ अर फिलम में काम मिलग्यौ।
अशफाक कादरी : आपरै उण ‘रोल’ में खास बात कांई ही?
पी. सुंदर : अेक फकीर रौ ‘रोल’ मिल्यौ हौ उण फिलम में। फकीर गांव मांय खैरात मांगण नै घर-घर जावै। गांव रौ जागीरदार अणूंतौ ई घमंडी अर हेकड़ीबाज हुवण रै साथै-साथै बदमास ई हुवै। वो फकीर नै खैरात तो देवै, पण साथै ई उणनै खरी-खोटी ई सुणावै। फकीर उणरै दियोड़ी खैरात फेंक देवै। इण सीन नै देख’र दरसकां म्हारै अभिनय री घणी-घणी सरावना करी। हॉल मांय खूब ताळियां बाज्या करती ओ सीन आयां। ‘फकीर’ रै इण रोल री सफळता रै बाद म्हनै ‘राजहठ’ अर ‘आल्द्दा-ऊदल’ फिलमां मांय मौकौ मिल्यौ, पण अे दोनूं फिलमां कोई खास चाली नीं।
अशफाक कादरी : इण फिलमां में काम कर्यां सूं आपनै कोई लाभ ई मिल्यौ?
पी. सुंदर : हां, मिल्यौ। आं फिलमां में कर्योड़ै अभिनय रै पाण ई म्हनै सन् 1975 में ‘मृगतृष्णा’ जिसी नामी फिलम में मुखिया रौ ‘रोल’ मिल्यौ। आ फिलम ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ सूं सम्मानित करीजी ही।
अशफाक कादरी : कांई आपनै उम्मीद ही क इण फिलम नै ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ मिलैला?
पी. सुंदर : म्हांनै तो टकै भर ई उम्मीद नीं ही। आपनै इण बात रौ इचरज हुसी क सिनिमा हाल में आ फिलम ‘फैल’ गई। अखबारां में तो इणरी घणी सोभा हुई, पण कमाई रै मामलै में घाटौ रैयौ। फिलम री दुनियां में आ इचरज री बात है।
अशफाक कादरी : ‘ट्रैजेडी’ री बात तो आपरै साथै रैयी ई हुसी, क्यूंकै आप सरकारी नौकरी में रैवता थकां फिलमां में काम करता रैया?
पी. सुंदर : हां, आपरी बात सोळूं आना साची है। म्हनै फिलमां में वाहवाही तो घणी ई मिली, पण भविस रा दरवाजा नीं खुल्या। म्हारी मनसा नाट्य कला रै छेत्र में काम करण री सदीव सूं ई रैसी। नौकरी में रैवतौ थकौ बीकानेर अर राजस्थान रै रंगमंच रै बधापै में खुद रौ योगदान देवण सारू लगौलग काम करतौ रैयौ। अठै री कीं संस्थावां नै साथै लेय’र तो काम कर्यौ ई, खुद री संस्था ‘भारतीय नाट्य कला विद्यापीठ’ री थापना कर’र उणरै त्हैत ई काम कर्यौ, अर आज ई कर रैयौ हूं। इण संस्था में नाट्य कला सिखावण री ई पूरी व्यवस्था है।
अशफाक कादरी : आप हिंदी फिलमां में तो काम कर्यौ ई, कांई आपनै राजस्थानी फिलमां में ई काम करण रौ मौकौ मिल्यौ?
पी. सुंदर : हां, लारलै बरस ‘रिलीज’ हुई राजस्थानी फिलम ‘थारी म्हारी’ जिकी क संदीप वैष्णव बणाई, उणमें म्हैं काम कर्यौ। इणरै अलावा बेगी ई ‘रिलीज’ हुवण वाळी उदयकिशन पुरोहित री राजस्थानी फिलम ‘करमाबाई’ में ई म्हारौ रोल है।
अशफाक कादरी : ‘करमा बाई’ में आपरौ कांई रोल है?
पी. सुंदर : इण फिलम में म्हैं रहमत चाचा रौ रोल कर्यौ है। करमा बाई रा मां-बाप जद तीरथ-जातरा माथै जावै, तद उणनै रहमत चाचै कनै छोड़ै। रहमत चाचौ उणरी देखभाळ करतौ थकौ उणनै सोरी-सुखी राखै। इण फिलम रै अेक सीन री चरचा म्हैं आप सूं करस्यूं—
करमा बाई किसनजी री मूरती आगै भोग लगावै। भगवान तो भावना रा भूखा हुया करै। अठीनै करमा तो जिद झाल’र बैठ जावै—भगवान नीं खावै तो म्हैं तो म्हैं ई नीं खावूं।
करमा री जिद देख’र रहमत चाचै री चिंता बधै। वो पीर री दरगाह माथै जाय’र दुआ करै। आखिर भगवान भोर लेवै। इण भांत भगवान रोजीना भोग लेवण लागै।
दर असल रहमत चाचै रौ रोल कौमी अेकता रौ प्रतीक है के आपां सगळा ई उण जमानै सूं भाई-भाई हां।
पी. सुंदर : ‘थारी-म्हारी’ में आपरौ कांई ‘रोल’ हौ?
अशफाक कादरी : इण फिलम में म्हैं करीम चाचै रौ रोल निभायौ। आप तो फिलम देखी ई हुसी क करीम चाचौ किण प्रकार सूं फिलम रै हीरो री मदद करै।
पी. सुंदर : आज राजस्थानी फिलमा रै ठैराव रौ कांई कारण है?
अशफाक कादरी : राजस्थानी फिलमां रै ठैराव रा केई कारण है। पैलौ कारण तौ म्हैं ओ मानूं क' राजस्थानी भाषा री फिलमां सारू अच्छै निरदेसकां अर तकनीशियनां री कमी है। दूजौ कारण, अच्छी कहाणियां फिलम री दीठ सूं नीं लिखीज रैयी है। तीजौ कारण, फिलमां बणाई जावै राजस्थानी में अर शूटिंग करीजै बबई में। गांव री बात स्हैर सूं जोड़ दी जावै तद उणरौ सगळौ सरूप ई बदळ जाया करै।
अशफाक कादरी : आप राजस्थानी ‘लोकशन्स’ बाबत कांई विचार राखौ?
पी. सुंदर : राजस्थानी ‘लोकेशन्स’ घणा फुटरा है अर सस्ता ई पड़ै। अठै रा मिनख बिना पइसा-टका खरच करियां ई काम कारण सारू राजी हुय जावै। ‘करमाबाई’ फिलम री शूटिंग रै दौरान ब्याव रै अेक दरसाव में गांव रा लोगां आप-आपरौ खरचौ कर’र अर सज-धज’र काम कर्यौ। ओ दरसाव जे बंबई जिस्यै स्हैर मांय ‘शूट’ करता तो हजारूं रिपिया लाग जावता अर उणां रा नखरा न्यारा सै'न करणा पड़ता।
अशफाक कादरी : राजस्थानी फिलमां रौ स्तर ऊंचौ उठावण सारू कांई राजस्थानी साहित्य कारगर हुय सकै?
पी. सुंदर : राजस्थानी साहित्य में अेक सूं अेक इधकी रचनावां है, अर रचनावां ई इत्ती तादाद में है क पूछौ मत! आं रचनावां में ई आपणी धरती री संस्कृति रा साचा दरसण हुवै। सो फिलमां मांय जित्ती सोवणी बातां अऱ सुंदरता दिखावणी हुवै, वे सब अठै री साहित्यिक रचनावां में है। इणां सूं मदद लेय’र अच्छी सूं अच्छी फिलमां बणाई जाय सकै।
अशफाक कादरी : राजस्थानी फिलमां भाषा रै विकास सारू कांई भूमिका निभाय सकै?
पी. सुंदर : अेक ठोस भूमिका निभाय सकै। जे राजस्थानी फिलमां चोखी चालै तो भाषा री अेक रूपता रौ सवाल ई हल हुय जावै।
अशफाक कादरी : ‘राष्ट्रीय फिल्मोत्सव’ में दूजी-दूजी भाषावां री फिलमां तो बाजी मार लेवै, पण राजस्थानी फिलमां रौ तो उण में प्रवेस तक नीं हुय पावै, इणरौ कांई कारण है?
पी. सुंदर : आपरी बात साची है। दूजी-दूजी भाषावां री फिलमां रै निरमाण में अच्छा तकनीशियन अर अच्छा निरदेसक हुवै, साथै ई शूटिंग सारू उणांरै अठै स्टूडियो हुवै, अर सरकारी सुविधावां ई भरपूर मिलै। पण आपां रै अठै है कांई! अे ई कारण क आपां घणा लारै हां।
अशफाक कादरी : कांई आपनै कदैई राजस्थानी में फिलम बणावण री सूझी?
पी. सुंदर : नीं, कदैई नीं। क्यूंकै म्हैं फिलम-निरमाण संबंधी कोई बातां जाणूं ई नीं। हां, म्हैं आपणी भाषा री फिलमां में अभिनय रौ काम लगन सूं कर रैयौ हूं, अर करतौ रैस्यूं।
अशफाक कादरी : राजस्थानी फिलमां सारू राज्य सरकार रौ कांई दायित्व है?
पी. सुंदर : राज्य सरकार रौ दायित्व है क वा राजस्थान में स्टूडियो बणवावै, जिणसूं क फिलम बणावण सारू बंबई नीं जावणौ पड़ै। इणरै अलावा राजस्थानी फिलमां रौ टैक्स माफ करै अर दूजी वे सारी सुविधावां ई देवै जकी क दूजी राज्य सरकारां देवै। राजस्थानी फिलमां रै विकास सारू इणनै राजस्थान भाषा री मानता देवण सारू ई आगै आवणी चाइजै। तद ई अठै री संस्कृति अर कलावां फूलैलां-फळैला, अर अठै री प्रतिभावां रै पनपण रौ मौकौ मिलैला।
अशफाक कादरी : आपरी आवण वाळी फिलमां कुण-कुण सी है?
पी. सुंदर : म्हारी आवण वाळी फिलमां है—‘जेठ जेठाणी’, ‘जय करणी मंगल’, ‘दो डाकू’, ‘बाबा रामदेव’ इत्याद, जिकी क निरमाण री प्रक्रिया में है। अर ‘करमा बाई’ तो आप बेगी ई देखस्यो।
अशफाक कादरी : राजस्थानी पत्रिका ‘माणक’ बाबत आपरा विचार?
पी. सुंदर : ‘माणक’ रौ तो म्हैं नियमित पाठक हूं। राजस्थानी भाषा रै विकास सारू आ पत्रिका जित्तौ काम कर रैयी है, उत्तौ दूजौ कोई नीं कर्यौ है। राजस्थानी फिलमां रै प्रचार-प्रसार रौ काम कर’र ‘माणक’ उण साहसी निरमातावां रौ मान बधायौ है, जिका क' आज फिलमां बणाय रैया है।