करेक्टर रै रोल री डैफ्थ देखां, लेंथ नीं

 

लारलै दिनां जयपुर में हिंदी फिलम ‘लाखा’ री शूटिंग हुई। इणमें ‘लाखा’ री भूमिका निभाय रैया है हिंदी फिलम जगत रा चावा खलनायक अर चरित्र अभिनेता प्राण। प्राण साहब जयपुर रै होटल ‘जयमहल’ मांय रुकियोड़ा हा। सो तै कर्‌यौ क लारलै बौत लंबै बगत सूं हिंदी फिलमां रै परदै माथै छायोड़ै इण बेजोड़ कलाकार सूं ‘माणक’ रै पाठकां सारू इंटरव्यू लियौ जाय। ‘लाखा’ फिलम रा लेखक अर निरदेसक नवल माथुर सूं घरू तालुकात, सो अेक दिन बेगी थकौ म्हैं उणां रै साथै लोकेशन माथै पूगियौ। इंटरव्यू लेवण री बात पैली ई तै हुय चुकी ही। उठै पूगियां प्राण साहब आपरी सदाबहार मुळक रै साथै स्वागत कर्‌यौ। औपचारिकता रै बाद बातचीत रौ सिलसिलौ सरू कर्‌यौ—

 

राजेन्द्र व्यास :  प्राण साहब, सबसूं पैली म्हैं आ जाणणी चावूं क आपरौ पूरौ नांव कांई है अर आप मूळ रूप सूं कठै रा हौ?

 

प्राण : (मुळकता थका)  म्हारौ पूरौ नांव आज तांई तो म्हनै कौई पूछियौ कोनीं। थे कांई पुलिस सूं आया हौ क अखबार सूं! वियां म्हारौ पूरौ नांव प्राण सिकंद है अर म्हैं पंजाबी हूं।

 

म्हारा पुरखा मूळ रूप सूं पंजब रै होशियारपुर रा रैवण वाळा हा, पण म्हारौ जलम दिल्ली में हुयौ। म्हारा पिताजी सड़क अर भवन निरमाण रा ठेकदार हा। जठै-जठै ई ठेकौ मिलतौ, उठै-उठै उणां नै जाणौ पड़तौ। वियां घणकरौ काम मेरठ, उन्नाव, रामपुर, देहरादून इत्याद जगावां, कैवण रौ मतलब लब उत्तरप्रदेश में चालतौ हौ। इव वजै सूं म्हारी पढाई-लिखाई ई उत्तररप्रदेश में ई हुई।

 

राजेन्द्र व्यास : आपरी पैली फिलम कुण-सी ही? इण बाबत कीं जाणकारी दिरावौ?

 

प्राण : म्हारी पैली फिलम ही ‘यमला जट’। पंजाबी भाषा री ही आ फिलम। उतरप्रेदश में म्हारी शिक्षा-दीक्षा हुवण सूं म्हारी जवान माथै उर्दू रौ असर अणूंतो हौ। सो दो दिन री शूटिंग रै बाद म्हैं ओ कैय’र बारै कर दियौ गयौ क ‘ओ सगस पंजाबी सही नीं बोल सकै!’  उणरै बाद वे अेक हफ्तै तांई म्हनै पंजाबी बोलणी सिखाई। (हंसर) यानी क अेक पंजाबी पुत्तर नै पजाबी बोलणी सीखणी पड़ी।

 

राजेन्द्र व्यास : लारलै कीं बगत सूं खलनायकी में नवौ दौर सरू हुयग्यौ है, आपरै बगत री खलनायकी अर आज रै बगत री खलनायकी बाबत आपरा कांई विचार है?

 

प्राण : देखौ सा, बात अैड़ी है क उण दिनां जद फिलमां बणती तद उणां में विलेन रौ अेक ‘सरटेन टाइप’ रो रोल हुया करतौ। यानी क पैली हीरौ नै मारौ, पछै हीरो सूं मार खावौ अर आखिर में चित्त हुय जावौ।

 

उण दिनां विलेन में अेक तरै री ‘स्पेसिफिकेशन’ ई हुया करती। अेक ‘डिग्निटी’ टाइप री ई चीज हुया करती। उण दिनां स्मगलर इत्याद तो हा नीं, सो इण टाइप रा ‘करेक्टर’ ई नीं हुया करता। विलेन या तो लड़की रै मां-बाप री दौलत सारू विलेनी कर्‌या करता, या पछै लड़की री मोहब्बत हासल करण सारू। उण में ‘रेंज’ घणी मिल जाया करती ही।

 

अर आज आप देख ई रैया हौ क आज रा जका विलेन है, वे ‘फाइट मास्टर’ माथै ज्यादा निरभर है बजाय अेक्टिंग रै। अर अेक्टिंग ई उणां री कांई है! बफूनी ज्यादा करण लागग्या है अेक्टिंग री बजाय। आ ई वजै ई क पब्लिक माथै उणां रौ प्रभाव नीं पड़ै जैड़ौ क अेक विलेन रौ पड़णौ चाइजै।

 

कैवण रौ मतलब ओ क विलेन जद बफून हुय जावै तो वो वा ‘इमेज’ नीं छोडै। अबै जठै लुगायां आ कैवै क दूध नीं पीवैला तो गब्बर आ जावैला, तो गब्बरसिंह रौ जिकौ करेक्टर हौ वो ओ ‘इम्पेक्ट’ छोडग्यौ। जठै तांई म्हारौ सवाल है, म्हैं विलेनी करी। पण रोल नै म्हैं सदीव ‘अंडर प्ले’ कर्‌यौ नीं क ‘लाउड’। वजै आ क ‘लाउड’ हुवण सूं करेक्टर री ‘ब्यूटी’ जावती रैवै। जिकी कीं ई करणौ हुवै आंख्यां सूं कर जावौ ‘अेक्सप्रेशन’ सूं ई कर जावौ, अेकाध डायलॉग सूं कर जावौ।

 

राजेन्द्र व्यास : यूं तो सरू सूं ले’र काफी लंबै अरसै तांई आप विलेन रै रूप में काम करता रैया, पण मनोजकुमार री फिलम ‘उपकार’ सूं अचाणचक आपरै रोल में ‘चेंज’ आयौ। इण ‘चेंज’ बावत आपरौ कांई कैवणौ है?

 

प्राण : हां, मनोजकुमार री फिलम ‘उपकार’ में ‘चेंज आवर’ हुवण रौ मौकौ मिल्यौ। हालांकै इणसू पैली ई अेक फिलम में म्हैं रोल ‘चेंज’ करण री ‘ट्राइ’ करी ही, पण वा फिलम चाली कोनी।

 

राजेन्द्र व्यास : कुण सी ही वा फिलम?

 

प्राण : ‘आह’! राज कपूर री ही आ फिलम। इण में म्हनै अेक ‘गुड मैन’ रौ रोल दियौ हौ। जे आ फिलम चाल जावती तो स्यात् उणी बगत सूं लोग म्हनै चेंज कर लेवता। पण आ फिलम चाली नीं। इण वास्तै बाद में कोई हिम्मत ई नीं करी म्हनै अच्छै रौ रोल देवण री।

 

अेक ई अेक किसम रा रोल करता रैवण सूं धीमै धीमै कांई हुवै क आदमी ‘बोर’ हुय जावै। म्हारै साथै जद इण भांत री स्थिति आवण लागी तो म्हैं म्हारी कानी सूं म्हारै विलेन रै ‘रोल्स’ में ‘कामेडी’ लावणी सरू करी। अेक ‘डिफरेंट टच’ देवण रै वास्तै। जियां क ‘कश्मीर की कली’, ‘खानदान’, ‘दस लाख’, ‘पत्थर के सनम’  इत्याद फिलमां, पण ओ ‘चेंज’ कामेडी री हद तांई ई हौ बफून री हद तांई नीं।

 

पछै ‘उपकार’ रै बाद तो हुलियौ ई ‘चेंज’ हुयग्यौ। बिलकुल ई बदळग्यौ। जिका लोग पैली, कठैई जावतौ तो, लारै सूं आवाजां लगावता क—‘ अे गुंडा! चार सौ बीस! डाकू!’  इत्याद, तो ‘उपकार’ रैं बाद वे ई म्हनै देखतां ई कैवण लागता—‘हट जाओ, मलंग चाचा आ रहे है! मलंग चाचा आ रहे हैं!!’

 

तो अेक फिलम सूं प्रभाव इत्तौ ‘चेंज’ हुय जावै। जे करेक्टर आपरौ अच्छौ हुवै, अर ‘परफोरमेंस’ आपरी अच्छी हुवै तो लोग सब पुराणी बातां भूल जावै।

 

‘उपकार’ रै बाद हुयौ ओ क बौत ई बढिया-बढिया रोल मिल्या। अर रोली ई भांत-भांत रा, जियां क ‘जंजीर’, ‘कसौटी’ ‘गंगा री सौगंध’, ‘बाबी’ ‘मजबूर’, ‘कालिया’ इत्याद फिलमां वाळा। इणां नै करण में मजौ ई आवतौ अर तबीत ई खुस हुवती।

 

राजेन्द्र व्यास : कुल मिला’र इण भांत रै बदळाव सूं आपनै आत्मिक संतोष ई मिल्यौ?

 

प्राण : सरू-सरू में तो मिल्यौ। पण पछै कांई हुवै क अेक ई भांत रा रोल करतौ-करतौ अभिनेता ‘बोर’ हुय जावै, जियां क म्हैं विलेन रा रोल करतौ-करतौ ‘बोर’ हुयग्यौ हौ। सो म्हैं पाछौ विलेन रा रोल करण लागौ। वियां अच्छा रोल ई कर लेवूं हूं। लारलै दिनां ज्यूं अेक फिलम बणी ‘इंसाफ कौन करेगा’, इणमें रोल तो पूरौ विलेन रौ हौ, पण आखिर में जा’र वो ‘चेंज’ हुय जावै।

 

राजेन्द्र व्यास : आज तांई आप जित्ता ई रोल कर्‌या, उणां में छाया रैया पण लारलै दिनां आप ‘कुदरत का कानून’ में बौत ई छोटौ रोल कर्‌यौ। सो कीकर?

 

प्राण : कोई ई करेक्टर रौ रोल ‘लेन्थ’ माथै निरभर नीं हुवै। आपनै म्हारै अभिनय वाळी अेक पुराणी फिलम री याद दिरावूं, स्यात् आपनै याद हुवै— अेक फिलम आई ही ‘शहीद’। भगतसिंह रै ऊपर आ फिलम मनोज कुमार बणाई ही। उण में पांच ‘सीन’ हा म्हारा, पण फेरूं ई म्हारै उण करेक्टर नै लोग आज तांई नीं भूल्या है। तो करेक्टर कोई साड़ी तो हुवै नीं क आप फट मीटर सूं नाप लियौ क सात मीटर री हुवणी चाइजै क पांच मीटर री।

 

दरअसल। कणी ई करेक्टर रै रोल में ‘लेन्थ’ नीं डेफ्थ देखी जावै। म्हैं तो देखूं क किणी नै ई इण चीज रौ खयाल नीं हुवै। आप ‘मजबूर’ तो देखी हुवोला! बौत ई खूबसूरत करेक्टर हौ माइकल रौ—माइकल दारू पीकर दंगा करता है!

 

कांई आप बताय सकौ क ओ करेक्टर कित्ती देर बाद किण ‘रील’ में आवै?

 

राजेन्द्र व्यास : नहीं!

 

प्राण  :  ‘इन्टरवल’ रै बाद 9 वीं रील में ओ करेक्टर आवै। तो उणमे ‘लेन्थ’ रौ सवाल कठै आवै! ओ करेक्टर कित्तौ ‘इम्पेक्ट’ छोड जावै, ओ आपनै बतावण री जरूरत नीं।

 

तो म्हे लोग किणी करेक्टर रै रोल री ‘डेफ्थ’ देखां, ‘लेन्थ’ दूजा लोग देखै। अबै ‘कुदरत का कानून’ रै करेक्टर नै ई देखौ कांई इणनै कोई भूल सकै! (अर आ बात कैवता-कैवता गाणै समेत आपरो वे रोल सुगावण लागा। म्हैं अजेज ‘हां’ करी क्यूं क उणी गाणै में पूरी फिलम सिमट्योड़ी है।)

 

राजेन्द्र व्यास : आज तांई आप जित्ता ई ‘रोल’ कर्‌या हौ, उणां में सूं अणूंता ई अच्छा आपनै कुण-कुण सा लगा?

 

प्राण : अेक फिलम ‘दिल दिया दर्द लिया’ में म्हैं काम कर्‌यौ हौ। इणमें रोल करतां बौत मजौ आयौ हौ।  दिलीप साहब रै साथै ही आ फिलम। पण आ फिलम घणी अच्छी नीं गई ही।

 

अेक छोटौ-सो करेक्टर अभिनीत कर्‌यौ फिलम ‘शहीद’ में। ओ म्हारै अच्छै करेक्टरां में सूं अेक हौ।

 

पछै म्हनै जिकौ सबसू खूब-सूरत करेक्टर अभिनीत करण नै मिल्यौ, वो हौ फिलम ‘जिस देश में गंगा बहती है’ रै राका रौ। उण करेक्टर में ‘ब्यूटी’ आ ही डाकू हुवतौ थकौ ई वो ‘लवर’ बौत बडौ हौ। आखिर में जद वो नायक राजू माथै बंदूक उठावै अर नायिका आडी आय जावै तो वो गोळी नीं मार सकै, वो आपरी बंदूक नीची कर लेवै। तो अच्छा करेक्टर तो जीवण में बौत कम अर कदै-कदैई ई मिलै।

 

अर पछै उण फिलम री वा खूबसूरती ई देखौ जिणनै स्यात् ई कोई ‘नोट’ करी हुवैला। डाकुवां री फिलम हुवता थकां ई ‘क्लाईमेक्स’ में अेक गोळी तकात नीं चाली! कित्तौ ग्रेट डाइरेक्टर है राजकपूर! दुनियां री किणी ई फिलम में आज तांई अैंड़ौ नीं दिखाईज्यौ। ओ कमाल तो राजकपूर ई कर सकै हौ अर कर्‌यौ। अर फिलम फेरूं ई सुपर हिट बणायली। आ ई वजै क ‘सबकॉन्शियस’ में वा फिलम आज ई लोगां रै बैठौड़ी है। अर पछै उण में म्हारौ ‘मैने-रिज्म’ ई हौ—हर बगत आपरै कालर माथै आंगळी चलावतां रैवणी। ओ हर आदमी नै सोचण सारू मजबूर करतौ। इण ‘मेनेरिज्म’ री मारफत वो आ ई परगट करतौ क डाकू बहादुर चायै कित्तौ ई क्यूं नीं हुवौ, उणरै ‘सबकॉन्शियस’ में आ ई बात रैवै क अेक दिन वो फांसी चढ जावैला। या अेक दिन उणरी गरदन कट जावैला। अे चीजां डायरेक्शन रै साथै-साथै चालै।

 

राजेन्द्र व्यास : ओ सब तो ‘सेल्फ मेड’ हुवतौ हुवैला?

 

प्राण : हां, ओ सब तो अपणै आप ई करणौ पड़ै।

 

राजेन्द्र व्यास : प्राण साहब, आप खुद अेक फिलम ई तो बणाई ही?

 

प्राण : हां, म्हारौ लड़कौ अेक फिलम बणाई ही ‘फरिश्ता’। पण अच्छी चाली नीं। ‘बिजनेस’ ई अच्छौ नीं कर्‌यौ वा।

 

राजेन्द्र व्यास : आगै ई कोई फिलम बणावण रौ इरादौ है कांई आपरौ?

 

प्राण : हां, म्हारौ लड़कौ बणाबैला। ‘स्टोरी’ माथै काम चाल रैयौ है।

 

राजेन्द्र व्यास : कांई आप ई उणमें रोल करौला?

 

प्राण : ओ तो स्टोरी माथै निरभर करै। जे म्हारै लायक हुयौ तो म्है जरूर करस्यूं।

 

राजेन्द्र व्यास : आपरै कैवण रौ मतलब ‘डेपथ’ वाळै रोल सूं है।

 

प्राण : हां, क्यूंक फिलम में कित्तौ ई लंबौ रोल क्यूं नीं हुवौ कारण रै हिसाब सूं तो दो-तीन ‘सीन’ ई हुया करै जिण में अभिनेता आपरौ प्रभाव छोड़ जावै। बाकीस तो कुटक भरी हुवै। आवणौ-जावणौ करेक्टर नै स्थापित करण सारू। अभिनेता नै तो करण सारू अेकाध ‘ड्रामटिक सीन’ मिल जावै तो वो काफी है।

 

राजेन्द्र व्यास : बंबई अर मद्रास रै फिलम प्रोडक्शन में जिकौ सबसूं मोटौ फरक है वो है टाइम रौ। दिक्खण वाळा 30 दिनां में फिलम-निरमाण कर लेवै—इणरै बाबत आपरा कांई विचार है?

 

प्राण  :  ‘प्रोड्यूसर्स ऑफ साउथ आर मोर आरगेनाइज्ड’ दिक्खण वाळा री ‘आरगेनाइजेशन’ बौत आछी है। इणरै अलावा वे लोग घणकरा मद्रास या हैदराबाद में शूटिंग करै। तो आर्टिस्ट जद उठै जावै तो उणां रै कनै दूजी कोई व्यस्तता नीं हुवै। अठै बंबई में हालत आ है क सुबै सूं 10 प्रोड्यूसर मिलण नै आयग्या। सेट माथै ई जावौ तो प्रोड्यूसर आय जावै।

 

इणरै अलावा दो-दो तीन-तीन शिफ्टां में काम करण सूं ई फिलम निरमाण में देरी हुवै। जदकै दिक्खण में अेक ई फिलम सारू आर्टिस्ट काम करै। सुबै सूं शाम तक। आ ई वजै क दिक्खण वाळा नै फिलम निरमाण में बौत कम बगत लागै। ‘रियली दे आर वेरी वेल ऑरगेनाइज्ड अेन्ड वेरी हार्ड वर्किंग पीपल’—प्रोड्यूसर सूं ले’र यूनिट रौ हरेक सगस। ‘वेरी अेफिसिअेन्ट पीपल’।

 

राजेन्द्र व्यास : अबै आप कीं निजू बातां ई बतावौला कांई? म्हारै पूछण रौ मतलब है आप आपरै परिवार बाबत कीं जाणकारी...

 

प्राण : म्हारै दो लड़का है अर अेक लड़की। तीनां नै ई परणाय दिया है। बडौ लड़कौ इंग्लैण्ड में है। वो पी. अेच.डी. करी है केमिकल इंजीनियरिंग में। आजकाल उठै ई नौकरी करै है। छोटोड़ौ लड़कौ फिलम लैण में ई आ रैयौ है—डायरेक्शन रै छेत्र में। आं दिनां मनमोहन दसाई रौ असिस्टेन्ट है वो अर लड़की आपरै सासरै में है, उणरौ पति बिजनेस करै।

 

जद तीनूं ई टाबरां री शादी करदी तो आ सोच’र मियाबीबी राजी हा क चालौ, सब जिम्मेदारियां खतम हुयगी। पण अबै पतौ पड़ियौ क जिम्मेदारियां खतम या कम हुवण री बजाय ज्यादा बढगी। क्यूंक पांच पोता पोती जका हुयग्या है।

 

राजेन्द्र व्यास : प्राण साहब, आखरी सवाल, नीं-नीं अरज—म्हारै ‘माणक’ रै पाठकां सारू आप जिकौ कीं ई संदेस देवणौ चावौ?

 

प्राण : बस, म्हैं तो ओ ई कैंवूंला क वे खराब प्रिंट विडियो माथै नीं देखै। क्यूक जिणां नै फिलम देखण रौ शौक है अर जिका अभिनय, फोटोग्राफी, संगीत इत्याद में रुचि राखै, उणां नै खराब प्रिंट सूं कोई लुत्फ नी आय सकै।

 

विडियो अेक ‘लग्जरी आइटम’ है। आराम सूं बैठ’र पसर’र फिलम देखली। पण इणसूं फिलम दरअसल देखीजै नीं। क्यूंक इत्ती छोटी-सी स्कीन माथै कौई कांई किणी कलाकार री आंख्यां रा अर चैरै रा दूजा ई ‘अेक्सप्रेशन’ देख सकै। म्हारौ कैवण रौ मतलब ओ सब कीं विडियो माथै निजर नीं आवै।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : प्राण सूं राजेन्द्र व्यास री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जनवरी 1988
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