म्हैं खुद नै राजस्थानी मानूं
पं. जसराजजी रौ जलम हरियाणै राज्य रै हिसार स्हैर में होयौ। यूं आपरा पूर्वज मूळत: अलवर जिलै रै बैरवा गांव रा हा, इण वास्तै आप मूळत: तौ राजस्थान रा ई है। गायक घराणै में जलस होवण सूं गायन कानी आपरौ सैज रुझाण बाळपणै सूं ईं पैदा होयग्यौ हौ। आप आपरै बडै भाई मणिरामजी सूं संगीत री तालीम लीवी अर वादन रै छेत्र में प्रवेस कर्यौ। पण औ छेत्र कीं रास नीं आयौ, सो वै गायन अपणाय लियौ। आपरौ ब्याव चावा फिलम निरमाता-निरदेसक शांताराम री सुपुत्री मधुरा सूं होयौ। आपरी गायन-कला रौ सनमान भारत सरकार ‘पद्मश्री’ सूं कर्यौ। लारलै दिनां आप जोधपुर पधार्यां। ‘माणक’ सारू आपसूं होयी प्रकाश पुहोहित री बात-बतळाव पाठकां रै निजरां सांमी।
प्रकाश पुरोहित : संगीत बाबत चरचा सरू कारण सूं पैली म्हैं आपरै खुद रै बाबत जाणणी चावूंला। मतळब के आपरौ जनम कठै हुयौ, गायन रै प्रति आकरसण कीकर पैदा हुयौ, आप गायन री तालीम किण सूं लीवी इत्याद-इत्याद।
पंडत जसराज: म्हैं मूळत: मेवाती घराणै रौ हूं अर संगीत री शिक्षा म्हैं म्हारै बडै भाई पंडित मणिराम सूं लीवी। यूं म्हारौ जनम हरियाणै रै हिसार में होयौ, पण म्हैं खुद नै राजस्थानी ई मानूं। कारण के म्हांरौ मेवाती घराणौ राजस्थान रौ है। वियां म्हारौ भावात्मक संबंध जोधपुर सूं घणौ है, क्यूं के मेवाती घराणै रा पैला उस्ताद बगे नजीर खां जोधपुर राज्य रा राजगायक हा। यूं वै अलवर रै नजीक रवा गांव रा हा। आपरै जीवण रै लारलै दिनां में वै भोपाळ राज्य रा राजगायक रैया। म्हांरी चार पीढियां सूं गायन-परंपरा चालती आ रैयी है।
सरू-सरू में तबलौ बजाया करतौ हौ। कारण वां दिनां ‘तबलौ वादन’ आछी निजरां सूं नीं देख्यौ जावतौ हौ। अेकर लाहौर में अेक कार्यक्रम रै दौरान म्हारौ अपमान होयग्यौ, तद सूं म्हैं तबलौ बजावणौ छोड दियौ अर गायन रै छेत्र में आयग्यौ। म्हारौ विवाह फिलम निरमाता-निरदेसक वी. शांताराम री सुपुत्री मधुरा सूं होयौ। औ प्रेम विवाह हौ। वा म्हारै गायन माथै मुगध हो’र रीझगी ही। विवाह रै कीं बगत बाद आज सूं कोई बीस बरस पैली बंबोई आयग्या, तद सूं बठै ई हूं।
प्रकाश पुरोहित : तौ पंडितजी, अबै आप आ बतावो के संगीत रौ काळ सूं सांस्कृतिक अरथां में कांईं संबंध है, खास करनै गायन संगीत रौ?
पंडत जसराज : बौत गहरौ संबंध है। जनम सूं ले’र मिरतू तांईं हर काळ रौ आपरौ अपणौ संगीत है, इण में आ बात साफ है के औ संबंध गायन रौ ई है, वादन रौ नीं। इण में ई खास करनै लोक संगीत रौ काळ सूं सांस्कृतिक अरथां में न्यारै-न्यारै अवसरां माथै न्यारौ-न्यारौ संगीत है।
प्रकाश पुरोहित : संगीत में ताळ रौ दार्शनिक महत्व कांईं है? मात्रावां री मारफत समै रौ विभाजन क्यूं जरूरी है? आपरी राय में ताल समै रौ विभाजन है या काळ में व्यवधान?
पंडत जसराज : ताळ सूं लय बणै अर लय ई समै नै विभाजित करै। लय, जकी के शाश्वत् है—हर वस्तु में विद्यमान है। इणरौ दार्शनिक महत्व औ हो सकै के म्है किणी चीज नै ताळबद्ध कर देवां। वियां दार्शनिकता सबदां माथै निरभर है। लय शास्त्रीय संगीत रौ अविभाजित अंग हैं, वियां उणनै न्यारौ ई कर्यौ जा सकै।
प्रकाश पुरोहित : गायक आपरै सरवोच्च सिरजणाऊ छिणां में कांईं हासल या संप्रेषित करणौ चावै?
पंडत जसराज : आप आपरा उद्देश्य अर आप-आपरी दिसावां है। कोई लोक तो कोई परलोक (ईश्वर) नै हासल करणौ चावै अर कोई ‘स्वांत: सुखाय’ सारू। म्हारी कोसिस ईश्वर री भगती है। क्यूं के गायन सूं अणजाणै में ईश्वर री भगती ई हो जावै;जदपि औ लंबौ रस्तौ है। भगती रौ सैल-सैज मारग संगीत है, इणी वास्तै जित्ता ई महान संत, जियां रामदास, कबीर, सूरदास, मीरां इत्याद होया—वां गा-गा’र भगती कीवी। इणी सूं वां रै नांवां सूं जथा ‘सूरदासी मल्हार’, ‘रामदासी मल्हार’ रागां बणी।
प्रकाश पुरोहित : मल्हार ई क्यूं?
पंडत जसराज : मल्हार बिरखा री राग है। चूंकै गावतां-गावतां भगती में ओत-प्रोत हो’र रोवण लाग जावणौ यानी के आंख्यां सूं बिरखा होवणी ई, उण गति सारू जिण स्वरां अर सबदां रा प्रयोग कर्या गया, मल्हार कैवीज्यौ होसी। वियां आ म्हारी निजू राय है।
प्रकाश पुरोहित : ‘स्वर-विस्तार’ कांईं है?
पंडत जसराज : ‘स्वर-विस्तार’ संगीतज्ञ री आपरी अेक कल्पना है। आम तौर माथै विलंबित गति नै ‘स्वर-विस्तार’ सूं तेज कर्यौ जावै। तानां ई ‘स्वर-विस्तार’ है। अठै अेक बात साफ कर दूं के आज रा केई संगीतज्ञ चूंकै साहित्य सूं न्यारा नी होवै, इण वास्तै वां री प्रस्तुति में तानां इत्याद बेसी होवै जद के पुराणै बगत में संगीतज्ञ साहित्य रा ई आछा जाणकार होया करता हा। ध्रुपद में तानां नीं होवै, कारण के उण मे साहित्य होवै।
प्रकाश पुरोहित : स्वर रै माध्यम सूं भाव रौ विस्तार करौ या भाव में उपस्थित समै रै बोध रौ?
पंडत जसराज : भाव में उपस्थित समै रै बोध रौ।
प्रकाश पुरोहित : स्वर-विस्तार रौ समै रै साथै कड़ीबद्ध या नियमबद्ध... कांईं संबंध है?
पंडत जसराज : जिण सबदां नै ले’र म्हे चाल रैया हां, वां रै नजीक राग रै अनुरूप म्हे स्वर ला सकां, उत्ता ई भावपूरण कर सकां। म्हांरै शास्त्रीय संगीत में न्यारै-न्यारै समै री न्यारी-न्यारी रागां हैं, भाव ई बैड़ा ई न्यारा-न्यारा है अर समै रौ राग रै मुताबिक ई स्वर-विस्तार होवै। स्वर में ई भेद है। सुबै अर सांझ रै ऋषभ में फरक है। सुबै सवाणी शुद्ध ऋषभ तौ सांझ रा ऋषभ षड़ज री कानी जावै। भैरव अर पूरब री ऋषभ बौत सीधी तौ श्री री ऋषभ सीधी कोमल है।
प्रकाश पुरोहित : औ फरक क्यूं है?
पंडत जसराजजी : म्हनै नीं मालम।
प्रकाश पुरोहित : गायन रै बगत गायक रौ मुद्रावां बणावणौ या हाव-भाव रौ घणापौ कांईं उचित है? जियां के पं. नारायण राव व्यास इंणनै अनुचित मान्यौ है।
पंडत जसराज : म्हैं इण बाबत पंडितजी सूं सहमत नीं हूं। जकौ ई साहित्य या संगीत सूं सैंधौ है, उणरै चैरै माथै तौ हाव-भाव आवैला ई। हां, हद सूं ज्यादा मुद्रावां बणावणी दोषपूरण है।
प्रकाश पुरोहित : आप गायन रै बगत ‘स्वर मंडल’ रौ ई प्रयोग क्यूं करौ?
पंडत जसराज : म्हारी मानता है ‘स्वर मंडल’ सूं वातावरण में अेकदम वौ राग गूंजण लाग जावै, जिणमें म्हैं गा रैयौ होऊं। हां, जकौ संगीत में जित्ती समझ राखै, वौ उण वातावरण में उत्तौ ई आनंदानुभूति हासल कर सकै।
प्रकाश पुरोहित : विदेसां में भारतीय शास्त्रीय संगीत री कांईं स्थिति है?
पंडत जसराज : बौत चावौ है। वठै रा श्रोता भारतीय संगीत नै समझै या नीं समझै, उणमें रुचि पूरी लेवै। म्हनै म्हारै विदेसी कार्यक्रमां रै दौरान इटली, फ्रांस अर अमरीका में श्रोतावां री रुचि औरूं परिष्कृत लागी।
प्रकाश पुरोहित : ‘दूरदर्शन’ अर ‘आकाशवाणी’ रौ शास्त्रीय संगीत रै प्रचार-प्रसार में सैयोग कैड़ौक है?
पंडत जसराज : अपेक्षा री तुलना में सैयोग कम है। इणरै सारू प्रसारण री अवधि बढाईजणी चाहिजै।
प्रकाश पुरोहित : फिलमां अर शास्त्रीय संगीत रै बीच कांईं स्थिति है?
पंडत जसराज : हालांकै फिलमां में शास्त्रीय संगीत कदै-कदास ई देखण-सुणण नै मिलै, पण फिलमां—जकी के प्रचार-प्रसार रौ खास अर सशक्त माध्यम है—रै जरियै भारतीय शास्त्रीय संगीत रौ बखूबी प्रचार अर प्रसार कर्यौ जा सकै।
प्रकाश पुरोहित : आप फिलमां में क्यूं नीं गया?
पंडत जसराज : म्हारौ प्रण है के म्हैं गा’र ई कमावूंला, बजा’र नीं। वियां सन् 1953-1954 में व्ही. शांताराम ‘गीत गाया पत्थरों ने’ फिलम-निरमाण रै दौरान संगीत-निरदेसक रै रूप में प्रवेस रौ न्यूतौ दियौ, पण म्हैं उणनै मंजूर नीं कर्यौ। हां, फिलमां में गा सकूं, जे कोई कैवै।
प्रकाश पुरोहित : शास्त्रीय संगीत रै छेत्र में नवी पीढी रै बाबत आपरी कांईं राय है?
पंडत जसराज : नवी पीढी रा घणा लोग बुद्धिमान अर सक्षम है। वां रौ भविष्य ऊजळौ है अर म्हांनै ई वां सूं बडी-बडी आसावां है। पं. भीमसेन जोसी रै शिष्य श्रीकांत देशपांडे, कुमार गंधर्व रा पुत्र मुकुल शिवपुत्र अर म्हारा शिष्य साधना सरगम, अजय चक्रवर्ती, गिरीश अर पद्मजा बौत आछा गा रैया है। वै अेक दिन जरूर नाम कमावैला पूरी उम्मीद है।