ऊंट री खाल माथै मीनाकारी रा उस्ताद मोहम्मद असग़र उस्ता

 

राजस्थान री धरती सैकडूं बरसां सूं साधू-संतां, वीरां-सतियां अर कवियां-कलाकारां री रैयी है। साधू-संतां आपरी इमरत वाणी सूं लोगां नै सही रस्तौ दिखायौ, तो वीरां-सतियां इण धरती री मान-मरजाद खातर प्राण तकात होमता रैया। अर कलाकारां रौ तो कैवणौ ई कांई! आखी उमर कला री साधना में लीन रैय’र इस्यी-इस्यी सरजणावां करी क पूछौ मत! दुनिया रा लोग आज ई राजस्थानी कलावां नै देख’र इचरज करै अर बखाण करता नी थाकै।

 

इण धरती रौ इतिहास साख भरै क अठै री कलावां पीढी-दर-पीढी चालती आ रैयी है अर आज ई जीवती-जागती है। आं कलावां रा साधक आगै सूं आगै जिकौ इतिहास बणावता जा रैया है, उणसूं राजस्थान रौ सीस गरब सूं लगौलग ऊंचौ हुवतौ जा रैयौ है।

 

यूं तो आखै राजस्थान में भांत-भांत री कलावां री साधना में लाग्योड़ा अणगिणत कलाकार है, अर हर कलाकार री आपरी निजू खासियत है, ओळख है। इस्यौ ई अेक न्यारौ-निकेवळौ नांव है मोहम्मद असगर उस्ता। बीकानेर रा अे युवा कलाकार ऊंट री खाल माथै मीनाकारी जिस्यौ झीणौ काम करण में पक्का उस्ताद है।

 

कलाकार तो सदीव सूं ई राजा-महाराजावां, नवाब-बादसावां अर राव-रईसां रै ठिकाणां मांय रैय’र आपरी साधना करता आया। आपणै देस री घणकरी कलावां ठिकाणां रै सहारै सूं ई आगै बढती आई है। देस माथै जद ई दूजी संस्कृति रो प्रभाव पड़ियौ तो अठै री कलावां ई आपरौ सरूप बदळ’र उणरै साथै मिल परी’र अेक नवी शैली रै रूप में ऊभरी। सोनै रै काम री मीनाकारी, चित्रकला, कशीदाकारी अर नक्काशी रै काम माथै मुगल शैली रौ प्रभाव जरूर पड़्यौ, पण अठै रा कलाकारां भारत री संस्कृति रै सरूप नै कायम राखतां अठै री कलावां नै इण भांत लोगां रै सामी राखी क जिणसूं भारतीय कला री आत्मा नी मर सकी। इण भांत री साधना करण वाळै कलाकारां में बीकानेर रा उस्ता लोग ई रैया है जिणां रौ खानदान आज ई साधना में लीन है।

 

राजस्थान री धरती माथै यूं तो भांत-भात रा अणगिणत जीव-जिनावर है, पण ऊंट अठै जितरौ काम काढ सकै, उतरौ काम कोई दूजौ पशु नीं काढ सकै। ऊंट रै मर्‌यां पछै उणरी खाल ई भोत काम री। भांत-भांत री जिनसां उणरी खाल सूं बणाईजै जिकी लोगां रै रात-दिन काम आवती रैवै। पण कलाकार री निजर तो आखिर कलाकार री निजर ठैरी। वे हर चीज नै कला री निजरां सूं देखै। उस्ता लोगां री निजर ऊंट री खाल सूं बण्योड़ी चीजां कानी गई अर वे उणनै आपरी कलां सूं इतरी कीमती बणायदी के हर मिनख तो उणनै खरीद ई नीं सकै। पैली राजा-महाराजावां आपरै म्हैलां मांय सजावण सारू ले लेवता। आजकाल रईस लोग खरीदे। तो ऊंट री खाल माथै मीनाकारी री कला आज आखी दुनिया में चावी हुय चुकी है।

 

ऊंट री खाल माथै सोनै री झीणी-झीणी कारीगरी रौ सोवणौ मनमोवणौ काम करण वाळां में श्री मोहम्मद असगर रौ नाम चावौ। गयै मार्च म्हीनै री 12 तारीख नै राजस्थान रा मुख्यमंत्री थी हरिदेव जोशी आपरो काम देख’र घणा राजी हुया। वे ‘राजस्थान लघु उद्योग निगम लिमिटेड’ री तरफ सूं राज्य स्तरीय पुरस्कार देय’र आपरौ सम्मान कर्‌यौ। कला रै छेत्र मांय दुनिया में चावी जात में जाया-जनम्या श्री मोहम्मद असगर रौ जनम 6 जुलाई 1955 में बीकानेर स्हैर में हुयौ। दीवाळी रै मौकौ प्रस्तुत है ‘माणक’ रै पाठकां सामी प्रस्तुत है असगरजी सूं करीजी बातचीत—

 

इसरार हसन कादरी :  कला रै छेत्र मांय उस्ता आज चौफेर चावा है, खास करनै आपरै परिवार रौ इण छेत्र मांय कांई योगदान रैयौ है?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : म्हारा दादौसा इलाही बख्शजी उस्ता जर्मनी रै नामी चित्रकार अे. अेच. मूलर साहब रा चेला रैया। मूलर साहब बीकानेर म्हाराजा गंगासिंहजी सूं ले’र उणां रै पोतै करणीसिंहजी रै वखत तांई रैया हा। करणीसिंहजी खुद ई बौत ऊंचा कलाकार है। तो राज री सेवा में तीस बरसां तांई रैय’र म्हारा दादौसा घणौ ई काम कर्‌यौ। आज ई वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर रै अेक ऊंचै कलाकार रै रूप में जाणीजै। म्हारै दादौसा रौ बणायोड़ौ महाराजा गंगासिंहजी रौ अेक पोर्ट्रेट आज ई संयुक्त राष्ट्र संघ रै मुख्यालय में लाग्योड़ौ है। म्हारा पिताजी अलाउद्दीन जी ई चित्रकला रा मानीता कलाकार है। उणां रा बणायोड़ा चित्र आपनै प्रदेस रै केई जैन मिंदारां में भींती चित्रामां रै रूप में देखण नै मिलसी। म्हारा दोनूं छोटा भाई मोहम्मद अय्यूब अर मोहम्मद इकबाल ई इण कला री साधना में लाग’र इणनै आगै बढावण सारू जतन कर रैया है।

 

इसरार हसन कादरी :  आपरी इण कला में रुचि किंयां हुई? आपनै इणरी प्रेरणा देवण वाळा कुण हा?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : बात आ है के म्हारा पिताजी चित्रकारी रौ काम कर्‌या करता। टाबरपणै में म्है उणां रै बणायोड़ै चित्रां नै देख’र म्हैं ई भींतां काळी करतौ। म्हारी काळी-कोजी लीकटियां देख’र अेक दिन दादौसा घणा राजी हुया अर कोयलै री जगै म्हनै पेंसल पकड़ायदी। साथै ई कापी माथै चित्र बणावण रौ तरीकौ ई बताय दिया। उण दिन रै बाद कदैई दादाजी संभाळ लेवता तो कदैई पिताजी। बस, म्हारी साधना सिद्ध हुवती गई अर म्हैं ई म्हारै घराणै री कला-साधना खातर दोनां सूं ई प्रेरणा लेवतौ रैयौ।

 

इसरार हसन कादरी : आप इण भांत घरै सीखण रै अलावा कदैई किणी संस्था सूं जुड़’र विधिवत इण कला री शिक्षा लीवी कांई?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : म्हारै परिवार सगळा ई लोग कलाकार हा, सो म्हनै सीखण सारू कठैई दूजी जगै जावण री जरूरत नीं पड़ी। हां, सन् 1975 में राजस्थान सरकार म्हांरी जात रै नाम सूं बीकानेर में ‘उस्ता कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर’ खोल दियौ। इण सेन्टर रा निदेशक बणाईज्या पद्मश्री हिसामुद्दीन उस्ता, जिणां री देख-रेख में म्है साल भर विधिवत् शिक्षा लीवी।

 

इसरार हसन कादरी : आप गिरस्थी रौ धाकौ धिकावण सारू कांई करौ?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : घर-गिरस्थी रा खरचां सारू म्है कला संस्थवां रौ काम करूं। इणरै अलावा बाजार री मांग मुजब भांत-भांत रा दूजा काम ई करतौ रैवूं, जियां टेबल लैम्प, फोटो फ्रेम, कुप्पी इत्याद अर इणी भांत रा छोटा-मोटा दूजा आइटमां माथै मीनाकारी रौ काम करण नै मिल जावै। इण भांत री कारीगरी वाळी चीजां री मांग बरौबर रैवै। आजकाल बडै कामां रौ चलण कम है, क्यूंकै इणां माथै खरचौ अणूंतौ ई हुवै। इण वास्तै बडौ काम दिनौदिन खतम-सो हुवतौ जा रैयौ है।

 

इसरार हसन कादरी : आपरै इण कलात्मक काम री कांई विशेषतावां है?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : म्हारै इण काम में ताराबंदी अर नक्काशी रौ काम खास है। बडी-बडी कुप्पियां रै बिचाळै ‘प्रोट्रेट’ ई बणाईजै।

 

इसरार हसन कादरी : ताराबंदी अर नक्काशी कांई हुवै?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : ज्यूं रात रा आकास में तारा चमकता दीखै, त्यूं ई जिण काम में इस्यी बातां दिखाई जावै वा ताराबंदी बाजै। अर जद अणूंतौ ई झीणौ काम कर्‌यौ जावै तो उणनै नक्काशी कैवै। ओ काम घणौ दोरौ अर मैनत रौ है। क्यूंकै चित्रकारी रै त्हैत फूल-पत्तियां में घणौ झीणौ काम करणौ पड़ै।

 

इसरार हसन कादरी : आप इण काम में सोनल रंग ई घणौ क्यूं बरतौ?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता  :  देखौ सा, आज जमानौ बदळग्यौ है। राजावां रै राज में तो सगळौ काम सोनै रै बरक रौ हुवतौ, जिणसूं ताराबंदी अर नक्काशी करी जावती। आज सोनौ घणौ मैंगौ तो है ई, साथै ई सरकारी नियत्रण ई है। इणी वास्तै म्हां आज फैक्टरियां में जिकी सोनल मिरगान बणै, उणनै काम में लेवां।

 

इसरार हसन कादरी :  इणरै अलावा आप दूजा कुण-कुण सा रंग काम में लेवौ?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : पैली तो म्हां लोग घरां ई रंग बणा’र काम में लिया करता, पण आज तो अेक सूं अेक बढिया बण्या-बणाया रंग बजार मांय मिलै। आं रंगां में लाल, हरौ, असमानी, पीळौ ई घणकरौ काम में लेवां। बात आ है के चित्रकारी जिस्या रंगां सूं उभरै, विस्या ई रंग बरतणा पड़ै। ओ तो सजावट रौ काम है। इणमें रंगां रौ कोई बंधन नीं है।

 

इसरार हसन कादरी :  आप बारीक काम तो घणौ बढिया करौ, पण इण काम में डिजायनां किंयां उठावौ?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : म्हांरै घराणै री आ कला म्हांरा बडेरा किणी नै सीधी तरियां नीं बतावता, जियां क आज म्हैं आपनै बताय रैयौ हूं। कारण के आज जमानौ बदळग्यौ हैं अर इण काम नै करण सारू दूजा साधन ई मिलण लागग्या है।

 

पैली डिजाइन उडावण खातर पुराणी माटी रा बरतन पीस’र कपड़छांण करता। पछै उण में गुळ अर सरेस मिला’र बढिया घोळ त्यार करता। उणरै बाद उणसूं डिजायनां त्यार उभारता। आजकाल इतरी मैनत कुण करै अर क्यूं करै जद ओ काम ‘प्लास्टर ऑफ पेरिस’ सूं हुय जावै। ओ सस्तौ ई पड़ै अर दूजी बात मैनत ई कोई ज्यादा नीं करणी पड़ै।

 

इसरार हसन कादरी : नक्काशी रै काम सारू जिकी चीजां आपनै त्यार करणी हुवै, वे आप खुद बणावौ के बजार सूं सीधी मोल लेवौ... जियां लैम्प, कुप्पी इत्याद?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : म्हांरी जरूरत मुजब चीज रौ म्हां पैली माटी रौ मॉडल त्यार करां। पछै उण माथै खटीक सूं चमड़ौ चढवा लेवां। जद चमड़ौ सूख जावै तो माटी निकाळ’र मॉडल नै काम में ले लेवां।

 

इसरार हसन कादरी : मॉडल माथै चमड़ौ चढावण माथै कितरौक खरचौ आवै? पूछण रौ मतलब ओ के खटीक नै कांई देवणौ पड़ै?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : देखौ सा, अे सब बातां मॉडल रै छोटै-बडै हुवण माथै निरभर करै। छोटै मॉडल माथै 25 सूं ले’र 40 तांई रौ खरचौ आय जावै अर वडै मॉडल माथै 100 सूं ले’र 150 तांई देवणा पड़ै। अे बजार भाव अर उणरी साइज रै हिसाब माथै है।

 

इसरार हसन कादरी :  आप कला री कुण-कुण सी शैलियां रौ काम करौ?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : म्है आपणै देस में प्रचलित सगळी ई शैलियां में रुचि राखूं। आं में काम ई कर्‌यौ है। जियां मुगल, किशनगढी, बीकानेरी, कांगड़ा, जयपुरी, अलवरी इत्याद।

 

इसरार हसन कादरी : भारतीय चित्रकला परंपराऊ रैयी है, इणरै भविस बाबत आपरा कांई विचार है?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : आपरी आ बात म्हारै वास्तै थोड़ी अटपटी-सी है। आज कला री मांग बौत तेजी सूं बढती रैयी है। इस्यै वखत में कलाकारां नै सरकार कानी सूं प्रोत्साहन मिलणौ चाइजै। पण आज स्थिति आ है के प्रोत्साहन तो दूर रैयौ, उल्टी उपेक्षा ई मिलै। सरकारी नौकरी में दो चार कलाकार खप जावै उणसूं कांई सांधौ लागै? बाकी सगळा तो हाथ माथै हाथ धर्‌या रैय जावै। ओ कला अर कलाकारां रौ दुरभाग ई है। कोरै प्रोत्साहन सूं कोई काम नीं चालै। उणां री कला नै आगै बढावण खातर सही तरीकै सूं आरथिक सैयोग ई मिलणी चाइजै, नींतर परंपराऊ कला तो सदीव रै वास्तै मर जावैला।

 

इसरार हसन कादरी : आप सोनल मनोवत रौ काम फगत चमड़ै री चीजां मायै ई करौ या दूजै पदारथां री चीजां मायै ई?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : मनोवत रौ काम लकड़ी, हाथीदांत, काच, पत्थर अर हार्डबोर्ड माथै ई हुय सकै। सो म्हैं करां ई हां।

 

इसरार हसन कादरी : आपरी इण कला सूं लोग घणा प्रभावित है, आपनै इण माथै कोई पुरस्कार ई मिल्यौ है कांई?

 

मोहम्मद असग़र उस्ता : हां, केई पुरस्कार मिल्या है। ‘आदर्श लोक बाल समारोह 1971’ री प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिल्यौ। ‘भारत स्काउटस अेंड गाइडस’ कानी सूं सन 1973 में हनुमानगढ में म्हनै सिरै सम्मान मिल्यौ। सन् 1974 में बीकानेर जिला प्रशासन री तरफ सूं ‘गणतंत्र दिवस’ माथै विशेष योग्यता री शील्ड अर प्रमाण-पत्र सन 1985 में मिल्या। इण साल 12 मार्च नै ‘राजस्थान हैण्डीकाफ्टस बोर्ड’ री तरफ सूं राजस्थान रा मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी 5 हजार रुपिया री राशि, अेक ताम्रपत्र अर शाल देय’र म्हारौ सम्मान कर्‌यौ।


स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : मोहम्मद असग़र उस्ता सूं इसरारहसन री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : अक्टूबर 1987
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