शिक्षा में समावेश रै बिना राजस्थानी रौ विकास संभव कोनी

 

दुर्गेश : आप लेखन री सरूआत कद अर किण भाषा में करी?

बैजनाथ पंवार : म्हारै लेखन री सरूआत 1944 ईं. सूं हुयी। ‘पारीक’ नांव री अेक सामाजिक पत्रिका में म्हारी पैलड़ी रचना हिंद में छपी ही।

दुर्गेश :  पछै आपरौ राजस्थानी लेखन कानी झुकाव किण भांत हुयौ?

बैजनाथ पंवार :  1954 में ‘मरुवाणी’ अर ‘ओळमो’ दो राजस्थानी पत्रिकावां निकळती। इण दोनूं में म्हारी अेक कहाणी ‘लाडेसर’ शीर्षक सूं छपी। इणनै पाठकां धणी पसंद करी। इणसूं म्हारौ सगळौ ध्यान राजस्थानी लेखन कानी केंद्रित होयग्यौ। म्हनै पाठकां री प्रतिकियावां सूं घणी प्रेरणा मिळी।

दुर्गेश : अबार तांई आपरी कितरी कृतियां प्रकाशित होयगी? वांनै राजस्थानी जगत सूं किसौक रेसपांस मिळ्यौ?

बैजनाथ पंवार : अबार तांई म्हारी कुल छ: कृतियां छपगी। दो राजस्थानी में (‘लाडेसर’ अर ‘नैणां खूट्यौ नीर’ कथा संग्रह) अर च्यार हिंदी में। बाकी पत्र पत्रिकावां में ई म्है खूब लिख्यौ है।

दुर्गेश :  इण वखत आप राजस्थानी रा प्रतिनिधि कथाकार किण किण नै मानौ?

बैजनाथ पंवार :  डॉ. नृसिंह राजपुरोहित अर अन्नाराम सुदामा घणौ आछौ लिख रह्या है। म्हैं इण दोनूं नै प्रतिनिधि कथाकार मानूं। युवा कथाकारां में सांवर दइया ई ठीक लिखै है।

दुर्गेश :  दूजी प्रांतीय भाषावां री तुलना में राजस्थानी इतरी समृद्ध क्यूं नीं बणीं?

बैजनाथ पंवार :  राजस्थानी समृद्ध तो किंयां बणती? दूजी भाषावां नै संवैधानिक मानता मिळ्यौड़ी है। आप आपरै क्षेत्र में वांनै फूलण फळण रौ भरपूर मौकौ मिळ्यौ है। वांरी तुलना में राजस्थानी नै कांई प्रोत्साहन अर सुविधावां मिळी है? औ तो राजस्थानी रचनाकारां अर इणनै वापरबा वाळां रौ जीवट है के वे इणनै जीवती राख रह्या हैं। लोक री बात करणियां वाळा राजनेतावां वास्ते तो आ लोकभाषा होवतां थकां ई मरी थकी है।

दुर्गेश : आजादी पछै राजस्थानी में कितरौ'क सिरजण हुयौ है?

बैजनाथ पंवार : आजादी पछै राजस्थानी में मोकळौ सिरजण हुयौ है। हर बरस हर विधा री निरी ई किताबां छपै। अर ओ सै कीं बिना प्रोत्साहन रै होय रह्यौ है। म्है केई बार सोचूं के जे प्रोत्साहन अर सुविधावां मिळै तो राजस्थानी घणी आगै बध सकै।

दुर्गेश :  राजस्थानी लेखन में अेकरूपता नीं होवण रौ कांई कारण है अर वा किंयां संभव होय सकै?

बैजनाथ पंवार : राजस्थानी लेखन में अेकरूपता नीं होवण री फालतू हाकौ है। भाषा अेक जीवन्त प्रकिया होवै। अेक खास वखत में उण खास भाषा री अेकरूपता उण वखत होवतै बेसी सूं बेसी लेखन अर उणरै वैवार सूं आवै सो वा वखत बीत्यां मतै ई निंगै आसी। इण सारू कियाशील लेखकां अर पत्रिका संपादकां रा सम्मेलन बार-बार होवणा चाइजै।

दुर्गेश : राजस्थानी विकास में जिकौ अवरोध आयोड़ौ है, उण वास्तै आप किणनै दोषी मानौ?

बैजनाथ पंवार : म्है इण में राज अर समाज दोनूं नै दोषी मानूं। राजनेतावां आपरी कुरसियां रै अलावा इण कानी कदैई ध्यान दियौ ई कोनीं। नीं समाज कोई खास ध्यान दियौ। इसी हालत में इणरौ विकास किंयां होवतौ। इण बाबत अबार अबै मामूली चेतना जागी है, बाकी तो कोई इण कानी सोचतौ आथ कोनी।

दुर्गेश : राजस्थानी में पत्र-पत्रिकावां री कमी रौ कांई कारण है?

बैजनाथ पंवार : राजस्थानी में पाठकां रौ तोड़ौ है। अठै रै लोगां रौ आपरी भाषा रै प्रति इतरौ खास लगाव नीं होवणै अर सरकारी उदासीनता रै कारण इण री आ हालत है। शिक्षा रौ माध्यम राजस्थानी नीं होवण सूं ई पाठकां रौ विस्तार नीं होय पायौ है।

दुर्गेश :  राजस्थानी रै समूचै विकास सारू कांई कियौ जाय सकै है?

बैजनाथ पंवार  : राजस्थानी रै समूचै विकास सारू इणनै शिक्षा रै पाठ्यकम में लेवणौ घणौ जरूरी है। पठन पाठन में आयो बिना इणरौ विकास संभव कोनी। संवैधानिक मानता अर मोकळी पत्र पत्रिकावां रौ प्रकासण ई घणौ जरूरी है। राजस्थानी साहित्य अकादमी रौ अध्यक्ष कोई सिरजणशीळ लेखक ई होवणौ चाइजै। तद ई वो इणरी पीड़ नै समझ सकै।

दुर्गेश : अबार आपरौ कांई लेखन चालै?

बैजनाथ पंवार :  अबार म्है उपन्यास अर कथावां लिख रह्यौ हूं। सागै अेक इतिहास री पोथी ई चाल री है।

दुर्गेश : नुंवै रचनाकारां सारू कोई खास बात आप कैवणी चावौला?

बैजनाथ पंवार : नुंवौ लेखक अध्ययनशील अंगां ई कोनीं। बिना पढ्यां आछौ लेखन संभव कोनीं। उणनै राजस्थानी रौ जूनौ साहित्य खूब बांचणौ चाइजै। इणरै सागै दूजी भाषावां रौ सम सामयिक साहित्य ई देखणौ चाइजै। लोक जीवण री समस्यावां रै अध्ययन मनन सूं ई आछौ लिख्यौ जाय सकै।  जिण विधावां में लेखन कम हुयौ है, नुंवा लेखकां नै वां में ई लिखणौ चाइजै।

दुर्गेश : लोग मानै के राजस्थानी पद्य री तुलना में गद्य कीं पोची पड़ै।

बैजनाथ पंवार :  म्है इण बात नै मानवा नै त्यार कोनीं। राजस्थानी रौ जूनौ गद्य तो सबळौ है इज पण मौजूदा वखत में गद्य री सगळी विधावां में खूब लिखीज रह्यौ है। इणसूं साहित्य री बढोतरी हुय री है।

दुर्गेश : राजस्थानी री न्यारी अकादमी बणी, छतांपण कीं बदळाव नीं लखावै। इण बाबत आपरौ कांई कैवणौ है?

बैजनाथ पंवार  :  म्है इण बात नै ई स्वीकार कोनीं करूं के न्यारी अकादमी बण्यां कीं बदळाव नी आयौ। हां आ बात जरूर है के आंपां  अकादमी सूं उम्मीदां घमी बांध ली ही। पण सगळा सुपना पूरा होवणा जरूरी क नीं इण वास्तै निरास होवण री कोई दरकार नीं है।

दुर्गेश : राजस्थानी री भणाई-गुणाई बाबत आपरी कांई राय है?

बैजनाथ पंवार : ओ काम तो घणौ जरूरी अर अेक दम पायै रौ है। जठातांई राजस्थानी में भणाई गुणाई रौ सिलसिलौ स्कूलां कालेजां में सरू नीं होसी इणरौ प्रचार-प्रसार संभव कोनीं। अबार अेक दो विश्वविद्यालयां में इण रौ पठन पाठन चालै। पण वो स्कूल स्तर सूं अनिवार्य होवणौ चाइजै।

दुर्गेश :  आजकाल रा कवि-लेखक पुरस्कारां सारू घणा हांफका मारै। इण बाबत आपरां कांई विचार है?

बैजनाथ पंवार :  आपरौ सवाल वाजिब है अर लोगां रा ईनाम-इकरार अर पुरस्कार सारू हांफळा मारणा ई बेजा कोनीं। मान सनमान री भूख तो साधु-संतां अर रिषि मुनियां नै ई रैवै। पण जिण लेखक रौ लेखन शाश्वत है वो इज पुरस्कार जोग है।

दुर्गेश :  ‘माणक’ बाबत आपरा कांई विचार है?

बैजनाथ पंवार :  ‘माणक’ राजस्थानी रै प्रचार प्रसार में घणौ योगदान दियौ है। दुनिया में जठै जठै राजस्थानी है, उठै ‘माणक’ पूगौ है। लोगां नै आपरी भूली बिसरी मायड़ भाषा रौ भान करायौ है। म्है इण रै ऊजळै भविष्य री कामना करूं।

                                                     

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : बैजनाथ पंवार सूं दुर्गेश री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : अप्रैल 1988
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