लोग घणां घूमबा-फरबा जावै छै

फेरूं म्हंई तो म्हारो घर भावै छै

तू छै जीं नै यो मनड़ौ चावै छै

नै थारै पाछै कांई न्है भावै छै

थारी तूं जाणै, म्हूं तो म्हारी क्है द्यूं

थारी म्हंनै तो घणी मन में आवै छै

तन में न्है होवै कांई बी बैमारी

जद दुनियां रा सुख–वैभव भावै छै

सरदा सांची हो तो, यो क्है ग्यो ‘रैदास’

जूत्यां रो पाणी गंगा बण जावै छै

मन में राखां ठौर तो छोटा घर में बी

हेताळा पावणां जतणा आवै समावै छै

जीं घर मान मिलै अर अपणौंपण लागै

‘कमसिन’ सज्जन ऊं घर में आवै छै

औरां रै लेखै कट ज्यावै जमारौ यो

या ‘कमसिन’ भाया अतणौ चावै छै

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्णा कुमारी ‘कमसिन’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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