बाळ पछेट्याँ दैरी छै

रात बी छै’र अँधेरी छै।

जीव कस्याँ साता खावै

तू जाबा की क्है री छै।

बादळा गरणार्‌या छै घणा

फाटबा की बस देरी छै।

म्हूँ काँई बरळार्‌यौ छूं

सुण बी री छै कै ब्हैरी छै।

म्हूं ठहर्‌यो गैल्यो-गाँग्यौ

पण तू छोरी शहैरी छै।

म्हूँ स्याळा को रूंख अ’र तू

ऊँदाळा की दफैरी छै।

थाग न्हँ पावैगो रे ‘यकीन’

प्रेम की नन्दी ग्हैरी छै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पुरूषोत्तम ‘यकीन’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
जुड़्योड़ा विसै