बची-खुची पूंजी भी इब तो छीजण लागी

सुपनां वाळी बातां रातां बीतण लागी

खुलो बारणो सामी देख ठिठक ठमकै सूं

थळगट बारै कोई चतर उडीकण लागी

विरहण रै हिवड़ै रो ताप हुवै कीं हळको

प्रीतम री यादां में पलकां भीजण लागी

होडा-होड दौड़ में दुनियां होय बावळी

दौलत री तिसना रै कीच कळीजण लागी

लांबी और अंधारी रातां नीं रैवैली

राती चूनड़ ओढ्यां उषा दीखण लागी

प्रेम अर विसवास सरीसो झीणो पड़दो।

क्यूं दुनियां मूसक रै माफक कुतरण लागी

जिण रै कारण जिणनै जीवण मंजिल मिलगी

वा संतान माता-पिता नै विसरण लागी

हिवड़ै रै समदर नै मथतां-मथतां ‘स्वामी’

कोई गज़ल प्रसव री राह अमूजण लागी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शंकरलाल स्वामी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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