जठै-जठै है आगुन लागी

मिल नै मित बुझायां सरसी

नफरत रा सै भाव भुलाकर

गीत प्रीत रा गायां सरसी।

करतब भूल जका सूत्या है

बां नै जा’र जगायां सरसी

हिम्मत हार जका बैठ्या है,

सा’रो दे’र उठायां सरसी

दुख रा मार्‌या जका भटकर्‌या

बां नै गळै लगायां सरसी

बेईमान जका घर भरर्‌या

बां नै चौड़ै ल्यायां सरसी।

के करणो है, के नीं करणो

ईं रो मरम बतायां सरसी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सीताराम महर्षि ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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