काम आपणां सूं आपड़ै निकळ म्हारो बहम जाय है
मनां ले यार रो इम्तिहान यारी को भरम जाय है
अैयां तो धज भला मिनख री ईं जमाना रो चलन है
पण तरेर आंख्यां, जद देखै बेटो, बाप सहम जाय है
मौजां करी दिन ऊग्यां, ढूंढता फिर्या ठंण्डी छां दोपैर्यां
हुई जद शाम उम्र तमाम शीशमहल तजुर्बा रो दरक जाय है
बै डींग हांकै हा दिखावांगा नई रोशनी नई पीढ़ी नै
देख्यो उजाळो नई रोशनी रो जद तंदूर मां मरवण जाय है
ईं आपा-धापी री रेल-पेल में जो हो जाय सो थोड़ो
ऊंका सुपणां रा रामराज्य रो ‘तेरह दिनां’ ओ बहम जाय है।