काळै धन रा करतब काळा

उणरी निजरां सामी जाळा

मिनख पणो लाजां मर ज्यावै

गेळ नित नुआं माण्डै पाळा

कैया पार पड़ेगी प्रभुजी

चोरी कर्‌यां आज रूखाळा

कोई कींको धणी धोरी

काम पड़्यां लेज्या सै टाळा

उणरा तो सो गुना माफ है

‌अै ठैर्‌या रूस्तम का साळा

खून चूस रैया गळो काट र्‌‌‌‌‌या

हाथा में मणिया की माळा

खुद म्हैला में मौज उठावै

जनता रै सुख सामी ताळा

जन की पीड़ा नै कद जाणै

‌अै सत्ता सुख में मतवाळा।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली गजल विशेषांक ,
  • सिरजक : सुरेन्द्र पारीक ‘रोहित’ ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी साहित्य संस्कृति पीठ
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