जो दिया करै सदा खुला हाथ सूं

मिलता देख्या है बांनै छप्पर फाड़ के

रोको आंनै या सामनै ल्याओ

कद तक शिकार होगी टाटी की आड़ में

इयां की सताता रह्या बोद्‌या नै जो

सांची कहूं काल बै रोवैगा दहाड़ के

रगां मां दोड़ है आंख सूं टपकै

कोई देखै ईं दिल नै चीर-फाड़ के

आंसू तू पूंछदे दीन दुखियां रा

मां सूं बिछुड़गा अै भीड़-भाड़ में।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : आर. सी. शर्मा ‘गोपाल’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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