पीड़ पचातां उमर बीतगी, कतरी और पचाणी बाकी

किणनै पूछूं, कतरी सांसां, तन में आणी-जाणी बाकी

जद सूं अठै भागीरथ लायौ— जुग बीत्या है गंगा बहतां

हियौ हिमाळा रौ ही जाणै, इण में कतरौ पाणी बाकी

म्हूं कळजुग रौ मिनख फिरूं हूं, स्वारथ री चादर में लिपट्यां

खेंच-खेंच नत ओढूं इणनै, कतरी खेंचाताणी बाकी

चार दिनां रा इण मेळा में, कतरा आया, कतरा आणां

धरमी-करमी सुखिया दुखिया, राव-रंक सैलाणी बाकी

अठै विदाई अगवाणी री, सब कुरस्यां पै चर-भर चालै

कतरां नै पहराई माळा, कतरां नै पहराणी बाकी

डाण चुकायां बिना भौम पै, अरज्यां, सगळी खारिज होवै

कतरां नै म्हैं डाण चुकायौ, जाणै कतरा डाणी बाकी

बगत-बगत रा डाड पद्‌या सब, नाटक सगळा खेल चुक्यौ हूं

थाक्यौ हूं हुंकारौ देतां, कतरी और कहाणी बाकी

सत करमां री खेती करतां, दांत पड़्या अर धोळा आया

कतरी क्यार्‌यां री व्ही पाणत, कतरी और पिलाणी बाकी

जग में तीनूं करज चुकातां, चारां ही पुरसारथ सागै

करमखेत नै रोज रूखाळूं, कतरी है निगराणी बाकी

मुट्ठी भींच अठै सब आया हाथ पसार्‌यां सबनै जाणौ

संझ्या पैली सब सुलटालै, बातां जो सुलटाणी बाकी

खातौ खोल खुलासौ कर दे चित्रगुप्त, लख चौरासी रो

म्हारी कतरी किश्तां चुकगी, कतरी और चुकाणी बाकी

धड़ौ-उथेलौ खूब कर्‌यौ ‘शिव’, भागदौड़ में उमर बिताई

थोड़ौ राम भजन भी करले, कतरी है जिनगाणी बाकी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शिव मृदुल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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