ढाई आखर प्यार का छै प्यार, समझो तो।

मत बणाओ ईं नैं थे ब्योपार, समझो तो।

ढूंढ़ता रस फिर रह्या खाली कळस लेके,

जिन्दगी खुद रस-कळस छै यार, समझो तो।

जात-धरमां में मिनख नैं बांटता डोलो,

देस को छै योही बंटाढार, समझो तो।

अकड़या-अकड़या फिर रह्या झूठा जगत माहीं,

सब सूं ऊपर बैठयो छै करतार, समझो तो।

चांदणी छै धूप छै झिलमिल घणी होवै,

ओस की-सी बूंद यो संसार, समझो तो।

आदमी सूं आदमी इकराम मिल जावै,

अेक पल में होवै बेड़ा पार, समझो तो।

स्रोत
  • पोथी : कथेसर पत्रिका ,
  • सिरजक : इकराम राजस्थानी ,
  • संपादक : रामस्वरूप किसान
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