बीती बातां मत दोहराव,

तूं अपणा मन नै समझाव।

आंसूड़ा ओटां में राख,

मुळकण मूंडा पे दरसाव।

होय गयो सो होय गयो,

कीं करणो उण रौ पछतावो।

पाणी री बातां कर—कर,

थूं मरुथळ नै मत तरसाव।

गागर में सागर बण जा,

कर खुद में जग रौ विग्साव।

जाण ले कस्तूरी रो भेद,

मन रा मृग ने मत भटकाव।

मेट गरब इण दिवला रौ

'किरण' अंधारा ने चमकाव।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत मार्च-अप्रैल 2007 ,
  • सिरजक : कविता 'किरण' ,
  • संपादक : लक्ष्मीकान्त व्यास ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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