समहर बळवंत वाहतां असमर।

छूटा फिरँग दळां रत छोळ॥

रातौ देख अचँभ रतनाकर।

चामल किम कीधौ रँग चोळ॥

रूकां झड़ हाडा अंगरेजां।

दल पंडव जूटा कुरु द्रोण॥

संभ्रम थयौ पूछवै सागर।

सरिता केम थयौ जळ श्रोण॥

हिन्दू गुरँड खगा हूँचकिया।

बहिया बाहण मूझ बिचाळ॥

दल सुध देवधुनी इम दाखै।

रतनाकर बहिया रत खाळ॥

असमर झटां बहादर वाळै।

थट हेंवर नर गरट थया॥

बसे पछै बैकुंठ बिचाळै।

काळै रँग जळ श्रोण किया॥

स्रोत
  • पोथी : प्राचीन राजस्थानी गीत (भाग – 5) ,
  • सिरजक : चंडीदान मिश्रण ,
  • संपादक : हनुवंत सिंह देवड़ा ,
  • प्रकाशक : साहित्य संस्थान, राजस्थान विश्व विद्यापीठ, उदयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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