बीरो नित आवै नहीं, पण नंह बिसरै हेत।

आंसूड़ा निथारजे, या मुरधर री रेत॥

बीरो बादळ रो पड़्यो, उमड़्यो हिय-द्रग हेत।

तूं मत रोजे बहनड़ी, या मुरधर री रेत॥

आभै चाल्यो बायरो, ले संग बादळियांह।

बीर बिन ढुळकण लगी, आंख्यां री पळियांह॥

झलमल-झलमल चिलक ले, पण ना कड़क अकार।

जामणजायो मारगां, सांडण रो असवार॥

आभै लूमै बादळी, आंख्यां लूमै पीर।

व्है अलूणी सावणी, आजे बाल्हा बीर॥

आसोजां आवै मती, मत आजे बैसाख।

सावणियै रुकजै तूं, घाटो सहजे लाख॥

दूरो बोल पपीहड़ा, रूखां-रूखां छाण।

जिणी छांव ऊभा धणी, बठै सुणाजे गाण॥

जळ धारां बूठण पड़ी, आभै घणी उफाण।

के हरख्या बन मोरड़ा, के हरख्यो किरसाण॥

सरग लजायो रूप सूं, मोहक मोरड़ियांह।

मुगट अधूरा ही पड़्या, पूंछ चांद जड़ियांह॥

मोर बजावै बांसर्‌यां, ले-ले ऊंची ढाळ।

दादर जोड़ै रागणी, पोखरियां री पाळ॥

बरसै दूरो बादळो, सीळो करतो ताव।

मांगै मोरड़िया मई, इण घर ढळतो आव॥

बादळियां नीची ढळै, कर सिगनल रो खेल।

चालै जद ही आगती, बण नदियां री रेल॥

अणहद थारो हेत यो, घटा इतरी टूट।

नवा सरोवर बंध रह्या, पाळां नंह जा फूट॥

बैंडी क्यूं व्ही बादळ्यां, रही हाथ नंह बाथ।

डोळ्यां-पाळ्यां डूबगी, मकियां बहगी साथ॥

हर्‌या खेत रै आलखै, हरिया नाचै मोर।

झर-झर बरसै सावण्यो, भादव बरसै घोर॥

जळधर थारा रूप नै, कुण नंह पायो देख।

काळी भींतां ऊपरै, उजळा पाया लेख॥

ढळता देख्या बादळा, जळता देख्या भेख।

रंग-रंगीला धणख रा, गळता देख्या लेख॥

करसा थारी झूंपड़ी, किण मगर्‌यां री ओट।

फूलां खिलियो आंगणो, ले हरियाळी गोट॥

कड़क इतरी बीजळी, मत ना इतरी रूस

टापर्‌यां टप-टप चूवणी, करले महल विधूंस॥

चातक झटपट झेल रे, चांचा ऊंची खोल।

धरणी छतां टूक व्है, अै मोती अणमोल॥

अेकज सांचै ढळ रह्या, खोयो नखत सरूप।

बादळ थारा बदन रा, देख्या लाखां रूप॥

भरत-भवानी बादळ्यां, बरसो दूधां धार।

दुरजण रा सिर तोड़द्‌यो, बिजळी थांकै लार॥

घूघरघेरी है निसा, घटा यूं कर मोत।

जळ-जळ नै बुझ जावसी, सो-सो जुगनू जोत॥

धोरां पै धोबा पटी, सावण सोभा नेक।

खाडा-नाडा पूरग्या, नदियां नाळा अेक॥

बरखा नवी नवल्लड़ी, रंग धणख तोरण्ण।

गाज-बाज बीजळ लियां, आयो इन्द परण्ण॥

ऊंचा नमसूं बरसतां, सब थळमळ्यो कळेस।

नित आबा री चावना, भारत हरियो देस॥

जळधारां गत री पड़ी, हरख्या सगळा खेत।

हरख-हरख माटी गळी, रिझ-रिझ राची रेत॥

नीचा खेतां धन भर्‌या, दिन दुख रा टळियाह।

करसा गावै वागड़्यां, ऊंची डागळियांह॥

जिण ठौंरा धूला उड्या, धूसर दीख्या गांव।

बठै सुवाणी बपरगी, बादळियां री छांव॥

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : जयसिंह चौहान ‘जोहरी’ ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर
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