सावन तो आखौ ई कढ़ ग्यौ बरखा कोनी आई
झगराळा को झण्डौ गड़ ग्यौ बरखा कोनी आई।
बारै सड़काँ पे लू लपकै, माँयें क्वाँड़-भीतड्याँ भभकै
चटक्या कण्ठ, जीवड़ा धधकै, बूँद न्हँ एक नलाँ सूँ टकपै
छा’र बादळा अस्याँ बकस ग्या,
जस्याँ तावड़ौ पगत्याँ चढ ग्यौ बरखा कोनी आई।
काँकड़ ऊभी तपै पीपळी, आँगन तुळसाँ और नीमड़ी
पाणी माँगै कुवाँ-बावड़ी, सूख्या पोखर ताळ, ताळड़ी
रूपाळी लूणीं धरती पे
पौन खम्हार बिवायाँ घड़ ग्यौ बरखा कोनी आई।
मेड़ाँ पे झूमै सरकण्डा, ऊसर में करर्या बरबूळ्या
चीलाँ गीधाँ का दन फर ग्या, चारूँ मेर कागळा उडर्या
बळद खड़्या दरवाजै रोवै
खेताँ कौ सगळौ तन बळ ग्यौ बरखा कोनी आई।
फस्लाँ नै जद बळती देखै, करसाणँ कौ हिवड़ौ धड़कै
छाती कूटै, माथौ ठोकै, कदीं करम का लेख नै कोसै
आँख्याँ सूँ आकास नै थाम्याँ
सोचै काँईं काळ तो पड़ ग्यौ बरखा कोनी आई
खड़्या तसाया रूँख-रूँखड़ा, पींजर हो ग्या ढोर-डाँगरा
तप की मारी फरै हाँपता, मोर, पपीया, सूर, गँडकड़ा
कतणी बार चड़्याँ कौ टोळौ
रेत में न्हा’र अटा पे चढ़ ग्यौ बरखा कोनी आई
प्हीर में पी की ओळ्यूँ आवै, सासरिये में बीरौ चावै
कुण गोरी नें हींदाँ झुलावै, कुण की ला’र मल्हाराँ गावै
सदाँ सतावै छौ चौमासौ
पण अब के तो यो बी लड़ ग्यौ बरखा कोनी आई।
बदळ्यौ रूप जमाना थारौ, काँईं न्हैं सुधर्यौ मनख जमारौ
जग नें पग मंगळ पे मार्यौ, भूकौ सोग्यौ टाबर म्हारौ
म्हां पाछी का पाछी रहग्या।
बगत अगाड़ी कतनौ कढ़ ग्यौ बरखा कोनी आई।