धान कोठली घुण घुसर्‌यो है, खेतां बड़र्‌यो दीवल्यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

पीस्योड़ै नै गंडक खार्‌या, आंधा बांटै रेवड़ी।

ताणू तण्यूं बाणू भरया, फेरूं घटगी जेवड़ी॥

नो गज खाज्या कतर ब्यूंत में, गज को चोळो सीमर्‌यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

नीं जावै कदै भेड़ियो, बाबो गयो रिवाड़ै में।

ठाय पड़ी जद जाय संभाळी, भेड बची नीं बाड़ै में॥

कित रोवै कित जाय पुकारै, बाबो डाकी नीसर्‌यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

इब ताणी तो बे लाटै हा, इबकै अणकी बारी है।

पण करसै की पीड़ पुराणी, बाड़ खेत नै खारी है॥

पग बळती नीं देखै कोई, डूंगर बळतो दीखर्‌यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

पूंचै सागै दगो करै है, आज हाथ की आँगळी।

लाठी जैंकी भैंस बतावै, न्याय बणी है पांगळी।

उल्टा बांस बरेली जार्‌या, चोर साह पर खीजर्‌यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

बैरी घात लगायां बैठ्यो, फोड़ा घालै मांयला।

छाती बैठ्यो सांप पीवणू, जीवण रा के गायला॥

बांबी कूट्यां नाग मरै नीं, झूठी लीकां पीटर्‌यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

पैल्यां नो मण तेल मंगायो, पछै राधा नटै है।

नाचूं कैयां आंगण बांको, ताल तबलची काटै है॥

हर डफळी को राग अधूरो, जोशी क्यां पर रीझर्‌यो।

जुलमी जुलम करै है मोटो, बिन पुरस्यो भातो जीमर्‌यो॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : महावीर जोशी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
जुड़्योड़ा विसै