देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो

स्रिस्ठी रो सूर हो जद, भारत में नूर हो

बिलखै बेनूर बालो, आरत सूरापणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

बखत पण बेवखत हुयो, देस भाण छिप गयो।

दीवटां री जोत किसी, भाड़ भूंजणो चिणो।

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

भाग बिसवहीर बण्यो, हाक-धाक धर्म तण्यो

टूटियो सितारो सजो, नाक वतन अुणमणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

घणै भार सार सूणो, दगियो रूंखड़ो दूणो

भाख फाटी फळां छियां सुखड़ा कयी गिणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

घणै भार सार सूणो, दगियो रूंखड़ो दूणो

भाख फाटी फळां छियां, सुखड़ा कयी गिणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

मैड़ी तणी मेढ़ डिगी, रण पगां टेढ थिग्गी

काळ रे अिन्याली तनै, आवै सुख भांगणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

फूटै रो-रो भोडड़ा, टूठ गया गोडड़ा

सैंकारै साथै गयो, सुरग अेक दो जणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

निब्बै कोड़ नैण रोया, सगबड़ हुया कोया।

सूर तेज मंदो पड़्यो, छागियो ठंडापणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

ज्वाहर हो’क लाल हो, दुनी रो दयाल हो

भारत तप्यो भाल पण बुझ गयो चानणो

देस तो दुखी घणो, हां रोंवतो जणो-जणो।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : नानूराम संस्कर्ता ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : जून
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