कान का किंवाड़ क्यूं जड़ै

जबान पर लगाम क्यूं पड़ै

बोल राज है कठै?

रे! सुराज है कठै?

बोल बोल मून क्यूं घड़ै?

जबान पर लगाम क्यूं पड़ै?

पंचायतां नै देखलै रै सांच छोड़दी

न्याय रै लगाय लाय नाड़ मोड़ दी

कणकती रै गांठ दे’र कड़ मरोड़ दी

बराबरी की लोच नै परात फोड़ दी

ताकड़ी तणी कठै?

सांच री मणी कठै?

तोल सूं बणी कठै?

हाट हाट देखलै रै बाट सै झड़ै

जबान पर लगाम क्यूं पड़ै—

बोल राज है कठै?

राज नै बिखेरियौ'र तोड़ दी लकीर रै

नोट की तो पोट आज ऊंचली फकीर रै

राबड़ी की तसळी में खाय खाय खीर रै

मोज मन की मुड़ रह्या है मोड अै मतीर रै

खेत हाळी कठै?

बाड़ा माळी कठै?

अब रूखाळी कठै?

काकड़ी पड़ी पड़ी बेल पर सड़ै

जबान पर लगाम क्यूं पड़ै

नोट ही की ओट में तो बोट का है ठाठ रै

सोट की वो चोट सूं कानून ही सपाट रै

खोट की है गोठ भाई पी भलांई चाट रै

रिस्वती की धार है के देख घाट-घाट रै

लूट फूलड़ा चरै

चोर चाकरी करै

झूंठ हाजरी भरै

सांच की तो झूंपड़ी पै कागला पड़ै

जबान पर लगाम क्यूं पड़ै—

बोल राज है कठै?

देस-देस जावणा बुलावणां रै पांवणा

उधार मांग खावणा’र बांटणा रै लावंणा

गरीब तो गरीब है पगां पड़्या है दावंणा

पावणा रिझावणा रै फूल रा बिछावणां

जेब आपणी कटै

गोठ घूघरी बठै

खूब रेवड़ी बंटै

पण पेट की तो कोथळी में उन्दरा लड़ै

जबान पर लगाम क्यूं पड़ै

बोल राज है कठै?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कल्याणसिंह राजावत ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 22
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