किनक सिंणगार सज बाघ चढ केसरी,

ध्यान मोनेसरी ब्रन्न ध्यावै।

अरक असमांन लग पांण तो ईसरी,

आज जोगेसरी सगत आवै।

रूप बिकरीळी चाळती चक्र नै,

जवन परजाळती जोत कुण झालै।

अरिण उल्लाळती अड़ती आभ सूं,

पिसण परजाळती बिघन पालै।

तपड़ त्रिसूळ नै बज्र जिम तोलती,

सकळावां सेवगां काज सारै।

धेक कर धसळ सूं करां खग धारका,

मसळ कर मारका मेछ मारै।

हक्र हमेसरा चक्र भैंसा हुवै,

बाढ बक्रां तणां रूद्र भाखै।

चाव चक्रां तणां अर्‌यां दळ चोगती,

राज अक्रां तणां मांण राखै।

साख बीसौतरै पाख मेहासदू,

छेड़ कर डाकवां पत्र छालै।

निडर नवलाख सूं झूल कर नीसरी,

हाक सूं धाक दरियाव हालै।

ओट आगा तणो कोट तम ऊबरूं,

मिनर जागा तणो चाव मोनैं।

धरम धागा तणो राखजै धिराणी,

ताम तागा तणी लाज तोनैं।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी शक्ति काव्य ,
  • सिरजक : शंकरदान सामौर ,
  • संपादक : भंवरसिंह सामौर ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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