जद सुण्यो धरा रो प्यारो पूत रैयो कोनी

मायड़ रो सेवा-भावी दूत रैयो कोनी।

तो गंगा रो धीरज तूट्यो

जमना रोई, सूरज फूट्यो

आंसूड़ा ढळक्या आंख्यां सूं

नैणां रो नेम-धरम लूट्यो

जीणै-मरणै री सै बातां

पोथ्यां में पंडत जी बांची

बिरखा ज्यूं पीड़ा बरस पड़ी

दामण जिण री पड़गी काची

अब न्याव खड़ी, खेवैयो पूत रैयो कोनी

मायड़ रो सेवा-भावी दूत रैयो कोनी।

इण पोळ-गळी-गळियारां मे

चौपालां, चौक, बजारां में

सै मरद-लुगायां उभा है

ढूंढै जिणनै नभ तारां में

टाबरिया बिलख-बिलख रोया

बैनां रोई बीरा म्हारा!

दस दिसा रोण नै जद लागी

है काम अधूरा अै सारा!

म्हारो सागी-सायंत रो दूत रैयो कोनी

जद सुण्यो धरा रो प्यारो पूत रैयो कोनी।

सूरज रो तपधारी हो बो

हो चांद जिस्यो ठंडो-सीळो

मिनखां रो मिनखपणो हो बो

हो लाल, सेत, लीलो, पीळो

बो देस-धरम री कीरत हो

मरजाद नेम रो पाळणियो

दुखड़ो धरती नै देय गयो

दुखड़ां नै तो हो टाळणियो

गांधी हाळै चरखै रो सूत रैयो कोनी

मायड़ रो सेवा-भावी दूत रैयो कोनी।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : अश्विन कुमार चित्तौड़ा ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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