भरी दुपैरी डूब्यो सूरज,

देस होयो रे बेहाल!

कै होयग्यो अंधियारो!

झर-झर रोवै भारत-माता,

अब कठै जवाहरलाल?

आंख रो उजियारो!

आय फंसी मंझधार रै नैया!

किण-विध लागै पार रे भैया!

छोड गयो हुंसियार खिवैया!

नैणां जळ री धार रे भैया!

खेवण-हार दीसै कोई

ढूंढूं लेयनै मसाळ!

तूटग्यो ध्रुव तारो!

सांति-घाट पर लाग्यो रे मेळो,

अणगिण जमघट होयग्यो भेळो!

आंख्यां सूं झर रैयो रेळो!

पुन्न होयो सैळो, का अैळो!

रोवतड़ी लिछमी, इन्द्रा रा,

किसनां पूंछै रे गाल!

धीर हियै में धारो!

फूल गुलाबी क्यूं रे मुरझायो,

रोई रे कळियां, पतझड़ आयो!

माळी रो हिवड़ो भर आयो!

अपणो होयो रे आज परायो!

राजू अर संजू जिस्या अब,

रोवै रे बाळ-गोपाळ!

कै छायो दुखियारो!

राज-पाट सगळो सुख छोड्यो,

निरधनियां संग नातो जोड़्यो,

आज अचानक क्यूं भल तोड़्यो,

बीच-भंवर, संकट री छोड्यो,

प्यारी-जनता हेला मारै

थां बिन म्हे कंगाल!

तूट्यो सुपनो प्यारो!

सांचो मीत मिनखपणै वाळो,

बैरी हो दानापण वाळो,

द्रिढ़ सैनानी सांयत वाळो!

पंचशील रो मानण वाळो!

सिसक्या, मिंदर, गिरजा, मस्जिद,

गरळाया रे घड़ियाळ!

कै रोयो गुरुद्वारो!

खेतां हळधर नीर रे बुहावै,

नैण बावळा रे बरस्यां जावै,

रोई धरती, रोयो रे अंबर,

सुध-बुध खोई रे सात-सम

धन-धन रे मोती रा जाया,

क्षिप्रा-मां रा लाल!

याद है उणियारो!

गैरो-गैरो फूल रे गुलाबी,

छोड्यो क्यूं भंवरा बड़ भागी,

लगन जुग्गां री छोड’र सागी,

कुणसी लगन प्राण रै लागी?

दिलड़ी रै तो आंसूड़ा ढुळकै,

लाल-किलै रा भाळ!

राज है थारो!

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : जगन्नाथ ‘विश्व’ ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.)
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