सहणी सबरी हूँ सखी, दो उर उळटी दाह।
दूध - लजांणो पूत, तिम, वळय - लजाणो नाह॥
हे सखी! और सब बातें मुझे सहन हो सकती है किन्तु यदि प्राणनाथ मेरे वलय (चूड़ीयों) को लजा दे और पुत्र मेरे दूध को तो ये दो बातें मेरे लिए समान रूप से दाहकरी एवं ह्रदय को उलट देने वाली है। असह्य है।