संत सूर, साहित सदा, उत्तम जग आधार।
समझै, सारै नर सुघड़, सरसावै संसार॥
संत सूर साहित सदा, पूरण जगत प्रकास।
सीख देय तम दूर सकल, अवनी पूरै आस॥
संत सूर साहित सदा, कर कर रूड़ा काज।
मुळकावै जीवण मनख, रूड़ो कर मन राज॥
संत सूर साहित सुखद, नित नव रस नवनीत।
भव मन जीवण मोह भर, पाळै मधुमय प्रीत।
संत सूर साहित सुखद, अवन तपत अंगार।
काळ रूप संहार कर, सद् हित सहज संभार॥
संत सूर साहित सदा, देवो सम दातार।
अजर अमर जुग-जुग अवन, भव पोषण भरतार॥
संत सूर साहित सदा, भव अघ दूर भगाय।
सरसा जन मन सरसता, हिवड़ै सद हरखाय॥
संत सूर साहित सुखद, कर धर सद् करवाल।
काट असद मन कुटिलता, रूप सत रखवाल॥
संत सूर साहित सुखद, चेतवे, गुण चार।
सद जीवण मन सरसता, अवर क्षमा उपकार॥