पुरस्कार पुचकारियो, लाड लडायो लोग।
सुर नैं सूर संभाळियो, जल्दी जाग्यो जोग॥
बळकर होयो भूंगड़ो, सुणकर कवियां मांन।
टूटी जद ही टांगड़ी, हार्यो भायी जान॥
लिछमी रै आगोस में, तपै जोर तपवंत।
ज्ञानी यै भगवंत, जग में पूजित केसिया॥
विस पीकर तूं कलमड़ी, इमरत रो कर दान।
मुरदां में भर प्राण, कांण राखलै केसिया॥
माया मनड़ो मोहियो, संत बघारै ग्यान।
बुगलै रो औतार बण, दियो मीन में ध्यान॥